Friday, December 28, 2012
Wednesday, December 26, 2012
अस्मिता की लड़ाई
दिल्ली गैंगरेप के विरोध में लोगों का गुस्सा चौतरफा देखा जा रहा है. लोग
बात कर रहे हैं कि लड़कियों-स्त्रियों की सुरक्षा के मुद्दे का स्थायी
समाधान किस तरह निकले. 1970 के दशक के उत्तरार्ध में मथुरा बलात्कार कांड
के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय का जो फैसला आया था, उसके बाद जिस तरह
देशव्यापी प्रदर्शन हुए थे और सरकार को बलात्कार संबंधी कानून में बदलाव
करना पड़ा था, उसी किस्म का वातावरण इस वक्त बन गया है.
बलात्कार की घटना के बाद अकसर पीड़िता को ही दोषी ठहराने की हमारे समाज में एक रीति है, जिसमें उसे ही आधुनिक कपड़े पहनने से लेकर अकेले सड़क पर चलने को लेकर उलाहना दी जाती है. लेकिन इसके विपरीत इस बार एक सकारात्मक बात दिख रही है, लोग खुद कह रहे हैं कि सुरक्षा के लिए हम अपनी लड़कियों को घर में कैद नहीं कर सकते, न ही हर सार्वजनिक स्थल पर या लड़की जहां जाये वहां परिवारवालों की निगरानी में रख सकते हैं. आखिर लड़की होने का खामियाजा वे कबतक भुगतती रहेंगी, इसलिए सुरक्षित समाज तो उन्हें चाहिए ही.
सवाल पहले सरकार से है कि आखिर घटना घट जाने के बाद सख्ती की याद क्यों आती है? अब तक कानूनों को सख्त बना कर उस पर अमल क्यों नहीं हुआ? फास्ट ट्रैक कोर्ट को नीतिगत स्तर पर स्वीकृति मिलने के बाद भी वह क्यों नहीं बन सका? इस घटना से उपजे जनाक्रोश के दबाव में अब दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने हाइकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिख कर अनुरोध किया है कि वे दिल्ली में फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने की प्रक्रिया को तेज करें. गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने भी संसद के पटल पर कहा कि वह सुनिश्चित करेंगे कि उपरोक्त मामले की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में हो.
सरकार अगर इच्छाशक्ति दिखाये तो जल्द सुनवाई और अपराधियों को कड़ी सजा संभव है. इसका उदाहरण राजस्थान में मिला है, जहां एक विदेशी पर्यटक के साथ हुए यौन अत्याचार के मामले में घटना के महज 15 दिन के अंदर सारी सुनवाई पूरी कर ली गयी थी और आरोपियों को सजा सुनायी गयी थी. ऐसी त्वरित कार्रवाई अन्य सभी मामलों में क्यों संभव नहीं है, ताकि बलात्कार पीड़िता का न्याय व्यवस्था पर भरोसा बन सके और वह मामले को भूल कर जिंदगी में एक नया पन्ना पलट सके. आम तौर पर यही देखने में आता है कि कभी न्यायालयों में लंबित मामलों की अधिक संख्या के नाम पर, तो कभी मामले की जांच में पुलिस द्वारा बरती जानेवाली लापरवाही एवं विलंब के नाम पर फैसला आने में सालों
बलात्कार की घटना के बाद अकसर पीड़िता को ही दोषी ठहराने की हमारे समाज में एक रीति है, जिसमें उसे ही आधुनिक कपड़े पहनने से लेकर अकेले सड़क पर चलने को लेकर उलाहना दी जाती है. लेकिन इसके विपरीत इस बार एक सकारात्मक बात दिख रही है, लोग खुद कह रहे हैं कि सुरक्षा के लिए हम अपनी लड़कियों को घर में कैद नहीं कर सकते, न ही हर सार्वजनिक स्थल पर या लड़की जहां जाये वहां परिवारवालों की निगरानी में रख सकते हैं. आखिर लड़की होने का खामियाजा वे कबतक भुगतती रहेंगी, इसलिए सुरक्षित समाज तो उन्हें चाहिए ही.
सवाल पहले सरकार से है कि आखिर घटना घट जाने के बाद सख्ती की याद क्यों आती है? अब तक कानूनों को सख्त बना कर उस पर अमल क्यों नहीं हुआ? फास्ट ट्रैक कोर्ट को नीतिगत स्तर पर स्वीकृति मिलने के बाद भी वह क्यों नहीं बन सका? इस घटना से उपजे जनाक्रोश के दबाव में अब दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने हाइकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिख कर अनुरोध किया है कि वे दिल्ली में फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने की प्रक्रिया को तेज करें. गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने भी संसद के पटल पर कहा कि वह सुनिश्चित करेंगे कि उपरोक्त मामले की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में हो.
सरकार अगर इच्छाशक्ति दिखाये तो जल्द सुनवाई और अपराधियों को कड़ी सजा संभव है. इसका उदाहरण राजस्थान में मिला है, जहां एक विदेशी पर्यटक के साथ हुए यौन अत्याचार के मामले में घटना के महज 15 दिन के अंदर सारी सुनवाई पूरी कर ली गयी थी और आरोपियों को सजा सुनायी गयी थी. ऐसी त्वरित कार्रवाई अन्य सभी मामलों में क्यों संभव नहीं है, ताकि बलात्कार पीड़िता का न्याय व्यवस्था पर भरोसा बन सके और वह मामले को भूल कर जिंदगी में एक नया पन्ना पलट सके. आम तौर पर यही देखने में आता है कि कभी न्यायालयों में लंबित मामलों की अधिक संख्या के नाम पर, तो कभी मामले की जांच में पुलिस द्वारा बरती जानेवाली लापरवाही एवं विलंब के नाम पर फैसला आने में सालों
Sunday, November 25, 2012
राज्य मद्द निषेध दिवस मनाया गया
माद्द निषेध दिवस के अवसर पर नेहरु युवा केंद्र के तत्वावधान में अम्बेडकर
क्लब मधुकरचक के द्वारा नुक्कड़ नाटक एवं प्रभात फेरी का कार्यक्रम क्लब के
अध्यक्ष कुमार दीनबन्धु के नेतृत्व में किया गया . कार्यक्रम द्वारा
ग्रामीण नवयुवकों में बढ़ती नशाखोरी एवं इसके कुप्रभावों पर चिंता व्यक्त
किया गया , साथ ही नशाखोरी से बचने के उपायों को नाटक मंचन के द्वारा
दिखया गया .कार्यक्रम में सचिव दिलीप कुमार , सदस्यों रमण ,संजीव ,मनीष
,दीपक ,मिथिलेश , गौरव , बैद्द्नाथ ,निर्भय आदि उपस्थित जबकि उपस्थित
ग्रामीणों में पूर्व मुखिया नागेश्वर यादव , भादो शर्मा , कैलाश मंडल ,
शिवन रजक , सुधीर यादव आदि के द्वारा क्लब के समाज सुधार कार्यक्रम को
सराहनीय बताया गया . 
विदित हो की अम्बेडकर क्लब मधुकरचक एक स्वयंसेवी सामाजिक संस्था के रूप में पिछले 14 वर्षों से वृहत उद्देश्य लिए कार्य कर रही है . इसके कार्यक्षेत्रों में निरक्षरता उन्मूलन , पर्यावरण संरक्षण , स्वास्थ्य एवं पोषण , स्वरोजगार प्रोत्साहन , लैंगिक समानता , रूढ़िवादी एवं अन्धविश्वासी परम्पराओं का उन्मूलन , दलित उत्थान , गंभीर रोग निरोधक उपाय जैसे कई समाज सुधार के क्षेत्रों को शामिल किया गया है . लेकिन सरकारी सहायता नहीं मिलने के कारण भारत सरकार के खेल एवं युवा मंत्रालय के नेहरु युवा केंद्र से पंजीकृत यह क्लब अपने उद्देश्यों को पाने में संघर्ष कर रहा है . सीमित संसाधनों के बावजूद यह क्लब अपनी स्वयं की रफ़्तार से कार्य कर रहा है .

विदित हो की अम्बेडकर क्लब मधुकरचक एक स्वयंसेवी सामाजिक संस्था के रूप में पिछले 14 वर्षों से वृहत उद्देश्य लिए कार्य कर रही है . इसके कार्यक्षेत्रों में निरक्षरता उन्मूलन , पर्यावरण संरक्षण , स्वास्थ्य एवं पोषण , स्वरोजगार प्रोत्साहन , लैंगिक समानता , रूढ़िवादी एवं अन्धविश्वासी परम्पराओं का उन्मूलन , दलित उत्थान , गंभीर रोग निरोधक उपाय जैसे कई समाज सुधार के क्षेत्रों को शामिल किया गया है . लेकिन सरकारी सहायता नहीं मिलने के कारण भारत सरकार के खेल एवं युवा मंत्रालय के नेहरु युवा केंद्र से पंजीकृत यह क्लब अपने उद्देश्यों को पाने में संघर्ष कर रहा है . सीमित संसाधनों के बावजूद यह क्लब अपनी स्वयं की रफ़्तार से कार्य कर रहा है .
Monday, November 19, 2012
छठ पर्व की आस्था एवं ऐतिहासिकता
छठ लोकपर्व है. इसके साथ लोगों की गहरी आस्था जुड़ी है. इसमें कोई
छोटा-बड़ा नहीं है, सभी के लिए यह एक जैसा है. छठ किसी जाति या समुदाय से
बंधा हुआ नहीं है. यही एक ऐसा पर्व है, जिसमें किसी पुरोहित की जरूरत नहीं
पड़ती. प्रकृति की पूजा के इस पर्व की खासियत तो देखिये, लोग उगते सूर्य की
बजाय डूबते यानी अस्ताचलगामी सूर्य को पहले अर्घ देते हैं. छठ के दौरान
सूर्य और छठी मइया (पार्वती), दोनों की पूजा होती है.
उदारीकरण के दौर में लगभग सभी पर्व-त्योहारों को बाजार ने अपनी गिरफ्त में ले लिया है. होली, दशहरा, दीपावली- सभी पर बाजार ने किसी न किसी रूप में प्रभाव डाला है. फिर चाहे वह रंग-बिरंगी पिचकारी हो या सजावटी दीये व बल्ब, बाजार का डंका हर जगह बज रहा है. लेकिन, छठ पर्व के आगे बाजार की अब तक नहीं चल पायी है. प्रकृति के इस पर्व में आज भी सब कुछ प्राकृतिक ही है. इतना ही नहीं, लगभग सभी पर्व-त्योहारों पर अपसंस्कृति भी हावी होती दिखायी देती है, लेकिन छठ इससे भी बचा हुआ है. सबसे मजेदार बात यह है कि दशहरा में जो युवक चंदा लेने के लिए हुड़दंग मचाते हैं, जोर-जबरदस्ती करते हैं, छठ आते ही व्यवस्थापक बन जाते हैं, कुछ लेने के बदले, देने के लिए तैयार हो जाते हैं. उनके मन में डर होता है कि छठ पूजन के दौरान अगर कुछ गलत करेंगे तो उसका गंभीर दंड मिलेगा और यदि अच्छा काम करेंगे तो काफी कुछ अच्छा होगा.
छठ की धार्मिक महत्ता बहुत अधिक है. पुराणों में भी छठ का वर्णन मिलता है. खास कर स्कंद और भविष्य पुराण में. इतिहास और अन्य धार्मिक ग्रंथों में भी इसकी चर्चा है. 1111 ई से 1155 ई तक गहड़वाल वंश के राजा थे गोविंद चंद्र. वे बहुत शक्तिशाली थे. आधा उत्तर प्रदेश यानी कन्नौज से लेकर पूरे बिहार तक उनका शासन था. उनके मंत्री थे लक्ष्मीधर. उन्होंने एक पुस्तक लिखी है ‘कृत्य कल्प तरू’. इसके अध्याय ‘व्रत विवेचन कांड’ में छठ का वर्णन है. कहा गया है कि कार्तिक शुक्ल षष्ठी को स्कंद माता (पार्वती) के पुत्र स्कंद यानी कार्तिकेय का जन्म हुआ और लोग उनके जन्मोत्सव को छठ के रूप में मनाने लगे. इस पर्व के दौरान महिलाएं जो गीत गाती हैं, उससे भी लगता है कि यह पुत्र प्राप्ति के लिए किया जानेवाला विशेष पर्व है. वैसे भी यह किताब (कृत्य कल्प तरू) करीब नौ सौ साल पहले लिखी गयी थी और कोई भी पर्व अचानक किसी किताब का हिस्सा नहीं बन सकता. कम-से-कम पांच सौ साल तो लग ही जाते हैं. इस हिसाब से छठ का इतिहास करीब डेढ़ हजार साल पुराना माना जा सकता है. मिथिला के पंडितों ने भी छठ पूजा का वर्णन अपनी रचनाओं में किया है. 14वीं सदी के आरंभ में राजा हरि सिंह के मंत्री थे पंडित चंदेश्वर. उन्होंने अपनी पुस्तक ‘कृत्य रत्नाकर’ में स्कंद जन्मोत्सव की चर्चा की है. इसी तरह पंडित रूद्रधर ने अपनी रचना ‘कृत्य वर्ष’ में सूर्य पूजा का वर्णन किया है.
वैसे वैदिक काल में भी छठ पूजा की बात आयी है. पंच देवता के रूप में पहली गणना सूर्य की ही होती है. ये हैं- सूर्य, विष्णु, शिव, पार्वती और गणोश. गायत्री मंत्र ‘ऊं भूर्भव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य: धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्’ वास्तव में सूर्य की ही स्तुति है और इस मंत्र के रचयिता है विश्वामित्र. इस तरह सूर्य की पूजा वैदिक काल से होती आ रही है. हां, यह सच है कि हर भगवान की पूजा समय खंड में बदलती रही है, जैसे आजकल हनुमान जी की पूजा करनेवाले बढ़ गये हैं, लेकिन सूर्य के प्रति श्रद्धा कभी कम नहीं हुई. छठ इसका सबसे अच्छा प्रमाण है.
बिहार में तो छठ को राज्य पर्व का दर्जा प्राप्त है. बिहारियों का यह सबसे बड़ा पर्व है. शायद ही कोई बिहारी छठ पूजा में शरीक नहीं होता होगा. अब तो छठ लोकल से ग्लोबल होता जा रहा है. जहां-जहां भी बिहारी रह रहे हैं, वहां-वहां छठ हो रहा है. फिर चाहे वे महाराष्ट्र, दिल्ली, पंजाब जैसे राज्य हों या फिजी, मॉरीशस जैसे देश, हर जगह छठ पर्व का आयोजन काफी धूमधाम से होने लगा है. अब तो बिहार सरकार की तरह दूसरी कई राज्य सरकारें भी छठ पर छुट्टी की घोषणा करने लगी हैं. बिहार से बाहर भी देश के कई प्रमुख शहरों में वहां की सरकार और राजनीतिक दल छठ को लेकर नदियों के किनारे विशेष व्यवस्थाएं करने लगे हैं. हालांकि इसके पीछे बिहारियों की बड़ी जमात को गोलबंद कर राजनीतिक लाभ लेने की भावना हो सकती है. लेकिन इस बहाने बिहारी अस्मिता को अब सम्मान भी मिलने लगा है. दूसरे राज्यों में छुट्टी की घोषणा होना बताता है कि उनके लिए बिहारी अब महत्वपूर्ण हैं, उनकी और उपेक्षा नहीं की जा सकती.
यदि अपने क्षेत्र बिहारीगंज की बात की जाय तो छठ में यहाँ की छटा देखते ही बनती है . शिवालय स्थित तालाब में स्थानीय विधायिका रेणु कुमारी के कोष से 44 लाख रुपये की राशि से निर्मित घाट की सुन्दरता देखते ही बनती है .
उदारीकरण के दौर में लगभग सभी पर्व-त्योहारों को बाजार ने अपनी गिरफ्त में ले लिया है. होली, दशहरा, दीपावली- सभी पर बाजार ने किसी न किसी रूप में प्रभाव डाला है. फिर चाहे वह रंग-बिरंगी पिचकारी हो या सजावटी दीये व बल्ब, बाजार का डंका हर जगह बज रहा है. लेकिन, छठ पर्व के आगे बाजार की अब तक नहीं चल पायी है. प्रकृति के इस पर्व में आज भी सब कुछ प्राकृतिक ही है. इतना ही नहीं, लगभग सभी पर्व-त्योहारों पर अपसंस्कृति भी हावी होती दिखायी देती है, लेकिन छठ इससे भी बचा हुआ है. सबसे मजेदार बात यह है कि दशहरा में जो युवक चंदा लेने के लिए हुड़दंग मचाते हैं, जोर-जबरदस्ती करते हैं, छठ आते ही व्यवस्थापक बन जाते हैं, कुछ लेने के बदले, देने के लिए तैयार हो जाते हैं. उनके मन में डर होता है कि छठ पूजन के दौरान अगर कुछ गलत करेंगे तो उसका गंभीर दंड मिलेगा और यदि अच्छा काम करेंगे तो काफी कुछ अच्छा होगा.
छठ की धार्मिक महत्ता बहुत अधिक है. पुराणों में भी छठ का वर्णन मिलता है. खास कर स्कंद और भविष्य पुराण में. इतिहास और अन्य धार्मिक ग्रंथों में भी इसकी चर्चा है. 1111 ई से 1155 ई तक गहड़वाल वंश के राजा थे गोविंद चंद्र. वे बहुत शक्तिशाली थे. आधा उत्तर प्रदेश यानी कन्नौज से लेकर पूरे बिहार तक उनका शासन था. उनके मंत्री थे लक्ष्मीधर. उन्होंने एक पुस्तक लिखी है ‘कृत्य कल्प तरू’. इसके अध्याय ‘व्रत विवेचन कांड’ में छठ का वर्णन है. कहा गया है कि कार्तिक शुक्ल षष्ठी को स्कंद माता (पार्वती) के पुत्र स्कंद यानी कार्तिकेय का जन्म हुआ और लोग उनके जन्मोत्सव को छठ के रूप में मनाने लगे. इस पर्व के दौरान महिलाएं जो गीत गाती हैं, उससे भी लगता है कि यह पुत्र प्राप्ति के लिए किया जानेवाला विशेष पर्व है. वैसे भी यह किताब (कृत्य कल्प तरू) करीब नौ सौ साल पहले लिखी गयी थी और कोई भी पर्व अचानक किसी किताब का हिस्सा नहीं बन सकता. कम-से-कम पांच सौ साल तो लग ही जाते हैं. इस हिसाब से छठ का इतिहास करीब डेढ़ हजार साल पुराना माना जा सकता है. मिथिला के पंडितों ने भी छठ पूजा का वर्णन अपनी रचनाओं में किया है. 14वीं सदी के आरंभ में राजा हरि सिंह के मंत्री थे पंडित चंदेश्वर. उन्होंने अपनी पुस्तक ‘कृत्य रत्नाकर’ में स्कंद जन्मोत्सव की चर्चा की है. इसी तरह पंडित रूद्रधर ने अपनी रचना ‘कृत्य वर्ष’ में सूर्य पूजा का वर्णन किया है.
वैसे वैदिक काल में भी छठ पूजा की बात आयी है. पंच देवता के रूप में पहली गणना सूर्य की ही होती है. ये हैं- सूर्य, विष्णु, शिव, पार्वती और गणोश. गायत्री मंत्र ‘ऊं भूर्भव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य: धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्’ वास्तव में सूर्य की ही स्तुति है और इस मंत्र के रचयिता है विश्वामित्र. इस तरह सूर्य की पूजा वैदिक काल से होती आ रही है. हां, यह सच है कि हर भगवान की पूजा समय खंड में बदलती रही है, जैसे आजकल हनुमान जी की पूजा करनेवाले बढ़ गये हैं, लेकिन सूर्य के प्रति श्रद्धा कभी कम नहीं हुई. छठ इसका सबसे अच्छा प्रमाण है.
बिहार में तो छठ को राज्य पर्व का दर्जा प्राप्त है. बिहारियों का यह सबसे बड़ा पर्व है. शायद ही कोई बिहारी छठ पूजा में शरीक नहीं होता होगा. अब तो छठ लोकल से ग्लोबल होता जा रहा है. जहां-जहां भी बिहारी रह रहे हैं, वहां-वहां छठ हो रहा है. फिर चाहे वे महाराष्ट्र, दिल्ली, पंजाब जैसे राज्य हों या फिजी, मॉरीशस जैसे देश, हर जगह छठ पर्व का आयोजन काफी धूमधाम से होने लगा है. अब तो बिहार सरकार की तरह दूसरी कई राज्य सरकारें भी छठ पर छुट्टी की घोषणा करने लगी हैं. बिहार से बाहर भी देश के कई प्रमुख शहरों में वहां की सरकार और राजनीतिक दल छठ को लेकर नदियों के किनारे विशेष व्यवस्थाएं करने लगे हैं. हालांकि इसके पीछे बिहारियों की बड़ी जमात को गोलबंद कर राजनीतिक लाभ लेने की भावना हो सकती है. लेकिन इस बहाने बिहारी अस्मिता को अब सम्मान भी मिलने लगा है. दूसरे राज्यों में छुट्टी की घोषणा होना बताता है कि उनके लिए बिहारी अब महत्वपूर्ण हैं, उनकी और उपेक्षा नहीं की जा सकती.
यदि अपने क्षेत्र बिहारीगंज की बात की जाय तो छठ में यहाँ की छटा देखते ही बनती है . शिवालय स्थित तालाब में स्थानीय विधायिका रेणु कुमारी के कोष से 44 लाख रुपये की राशि से निर्मित घाट की सुन्दरता देखते ही बनती है .
Saturday, October 27, 2012
रोजगार के अवसर
राज्य सरकार द्वारा जीविका प्रोत्साहन योजना के अंतर्गत सामुदायिक समन्वयक एवं क्षेत्रीय समन्वयक के पदों पर ऑनलाइन आवेदन मांगे जा रहें हैं ! अधिक जानकारी के लिए नीचे लिखे लिंक पर क्लिक करें -
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भ्रष्टाचारमुक्त भारत की शर्ते
पिछले कुछ अरसे से देशभर में भ्रष्टाचारी ताकतों से मुक्ति के लिए बेचैनी
का बढ़ना स्वागत की बात है. लेकिन भ्रष्टाचार से मुक्ति को लेकर जनमानस और
जानकार तीन समूहों में बंट गये लगते हैं. पहला समूह ऐसे उत्साही और सक्रिय
आदर्शवादियों का है, जो यह मानते हैं कि भ्रष्टाचार का मूल आधार संपन्न
वर्गो, अफसरों और नेताओं की तिकड़ी है. इनको काबू में लाने वाले नियमों व
कानूनों से हम भ्रष्टाचार मुक्त भारत बना सकते हैं.
दूसरा समूह ऐसे मध्यमार्गियों का है, जिनका मानना है कि भ्रष्टाचार की जड़ें मनुष्य की कुछ बुनियादी कमजोरियों में हैं. जैसे लोभ, भोगवासना, सत्ता की भूख आदि. इसीलिए भ्रष्टाचार का निमरूलन तो आदर्श स्थिति में ही संभव है. हमारे दैनिक जीवन में इसको निगरानी और नियंत्रण से कम किया जा सकता है और करना भी चाहिए. एक तीसरा समूह ऐसे लोगों का है, जिनकी दृष्टि में भ्रष्टाचार, संपत्ति और मुनाफे को आदर देने वाली पूंजीवादी व्यवस्था का अनिवार्य अंग है. इसमें मत्स्य न्याय ही चलता है. इसीलिए भ्रष्टाचार की चर्चा हमारा ध्यान कुछ बड़ी समस्याओं, जैसे- शोषण, विषमता और गरीबी, से हटाने की दोषी है. भ्रष्टाचार से लड़ना आग बुझाने की बजाय धुएं की शिकायत करना है.
इनमें से तीनों दृष्टियां आंशिक सत्य पर आधारित हैं. इनको मानने वालों को यह याद दिलाना प्रासंगिक होगा कि हमारा समाज शुभ व अशुभ शक्तियों के बीच खुली और छिपी टकराहट से ही आगे बढ़ता या पीछे फिसलता है. आज हमें सार्वजनिक जीवन में राष्ट्रहित की कीमत पर भ्रष्टाचार के बारे में चुप्पी रखने का अवकाश नहीं है, क्योंकि भ्रष्टाचारियों की छल-कपट से न सिर्फ विकासधारा अवरुद्ध है, बल्कि विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की तमाम संस्थाओं की जड़ें कमजोर हो रही हैं. अब भ्रष्टाचार का बढ़ना जन हितकारी लोकतंत्र की जड़ें कमजोर करना हो चुका है. इसीलिए इस देश को सक्रिय नागरिक हस्तक्षेप और रचनात्मक राजनीतिक सहमति की जरू रत है.
भ्रष्टाचार की चर्चा में यह दोष फैल चुका है कि कौन भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलने का अधिकारी बचा है? मेरी समझ से इससे बड़ी नासमझी का कोई बयान नहीं हो सकता कि ‘हम सभी जिंदगी की जद्दोजहद में अपनी औकात व जरूरत के मुताबिक भ्रष्टाचार करने की प्रवृत्ति रखते हैं. फर्क मात्र और अनुपात का ही है. कोई खीरा चोर तो कोई हीरा चोर. पूरा समाज किसी न किसी स्तर पर दोषी है.’ असल में भ्रष्टाचार सार्वजनिक पद का निजीहित के लिए दुरुपयोग करना है. इसमें किसी सरकारी प्रमाणपत्र के लिए तहसील के बाबू को दस्तूरी देने या अस्पताल में इलाज के लिए नेता से डॉक्टर की पैरवी कराने को शामिल नहीं किया जा सकता. यह सब हमारी व्यवस्था संचालन के दोषों के परिणाम हैं और अपनी अस्तित्व रक्षा के लिए आपदधर्म की मजबूरी के उपाय हैं.
अब प्रश्न यह उठता है कि भ्रष्टाचार की बाढ़ 90 के दशक से क्यों फैल रही है. इसके दो कारण लगते हैं. एक तो हमने उदारीकरण और वैश्वीकरण की दिशा में मुड़कर विषमता व संपन्नता के सहअस्तित्व वाली अभावपूर्ण व्यवस्था को खुली छूट दे दी है. दूसरे, राजीव गांधी के सत्ता विकेंद्रीकरण संविधान संशोधन के बावजूद राजसत्ता के सूत्रधारों के हाथ में ताकत का केंद्रीकरण हुआ है. इसके परिणामस्वरूप सत्ता की सीढ़ियों पर चढ़ कर संपत्ति बटोरना बहुत आसान हो गया है. इसे रतन टाटा जैसे सम्मानित लक्ष्मी पुत्र ने ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ की संज्ञा दी है. अगर अभाव, विषमता, केंद्रीकरण और संपन्नता की एकजुटता भ्रष्टाचार के विषवृक्ष के लिए खाद का काम कर रही है, तो इसके निमरूलन के लिए इन्हीं चारों पहलुओं पर काम करने की जरूरत है. रोटी (खाद्य सुरक्षा) और रोजी (आजीविका सुरक्षा) के लिए आम लोगों को अवसर व साधन उपलब्ध कराना जरूरी हो चुका है. इसी के साथ पढ़ाई (शिक्षा का अधिकार) और दवा (स्वास्थ्य का अधिकार) को भी हमारे राष्ट्र निर्माण का बुनियादी तत्व बनना चाहिए. इसके साथ पानी, आवास की व्यवस्था, सामाजिक न्याय और आत्म सम्मान की सुरक्षा को जोड़ देने से करोड़ों लोगों को हम भ्रष्टाचार की हजारों छोटी-छोटी यातनाओं से बचा सकते हैं.
गत 65 वर्ष में कांग्रेस-गैर कांग्रेस, स्त्री-पुरुष, सवर्ण-अवर्ण, उत्तर-दक्षिण, पूरब-पश्चिम, एक दल-बहुदल, नेता-प्रोफेसर, हर तरह के नुस्खे आजमाये गये हैं. और हर परिवर्तन से भ्रष्टाचार का बुखार एक डिग्री ऊपर ही चढ़ता गया है, ऐसा क्यों?
दूसरा समूह ऐसे मध्यमार्गियों का है, जिनका मानना है कि भ्रष्टाचार की जड़ें मनुष्य की कुछ बुनियादी कमजोरियों में हैं. जैसे लोभ, भोगवासना, सत्ता की भूख आदि. इसीलिए भ्रष्टाचार का निमरूलन तो आदर्श स्थिति में ही संभव है. हमारे दैनिक जीवन में इसको निगरानी और नियंत्रण से कम किया जा सकता है और करना भी चाहिए. एक तीसरा समूह ऐसे लोगों का है, जिनकी दृष्टि में भ्रष्टाचार, संपत्ति और मुनाफे को आदर देने वाली पूंजीवादी व्यवस्था का अनिवार्य अंग है. इसमें मत्स्य न्याय ही चलता है. इसीलिए भ्रष्टाचार की चर्चा हमारा ध्यान कुछ बड़ी समस्याओं, जैसे- शोषण, विषमता और गरीबी, से हटाने की दोषी है. भ्रष्टाचार से लड़ना आग बुझाने की बजाय धुएं की शिकायत करना है.
इनमें से तीनों दृष्टियां आंशिक सत्य पर आधारित हैं. इनको मानने वालों को यह याद दिलाना प्रासंगिक होगा कि हमारा समाज शुभ व अशुभ शक्तियों के बीच खुली और छिपी टकराहट से ही आगे बढ़ता या पीछे फिसलता है. आज हमें सार्वजनिक जीवन में राष्ट्रहित की कीमत पर भ्रष्टाचार के बारे में चुप्पी रखने का अवकाश नहीं है, क्योंकि भ्रष्टाचारियों की छल-कपट से न सिर्फ विकासधारा अवरुद्ध है, बल्कि विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की तमाम संस्थाओं की जड़ें कमजोर हो रही हैं. अब भ्रष्टाचार का बढ़ना जन हितकारी लोकतंत्र की जड़ें कमजोर करना हो चुका है. इसीलिए इस देश को सक्रिय नागरिक हस्तक्षेप और रचनात्मक राजनीतिक सहमति की जरू रत है.
भ्रष्टाचार की चर्चा में यह दोष फैल चुका है कि कौन भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलने का अधिकारी बचा है? मेरी समझ से इससे बड़ी नासमझी का कोई बयान नहीं हो सकता कि ‘हम सभी जिंदगी की जद्दोजहद में अपनी औकात व जरूरत के मुताबिक भ्रष्टाचार करने की प्रवृत्ति रखते हैं. फर्क मात्र और अनुपात का ही है. कोई खीरा चोर तो कोई हीरा चोर. पूरा समाज किसी न किसी स्तर पर दोषी है.’ असल में भ्रष्टाचार सार्वजनिक पद का निजीहित के लिए दुरुपयोग करना है. इसमें किसी सरकारी प्रमाणपत्र के लिए तहसील के बाबू को दस्तूरी देने या अस्पताल में इलाज के लिए नेता से डॉक्टर की पैरवी कराने को शामिल नहीं किया जा सकता. यह सब हमारी व्यवस्था संचालन के दोषों के परिणाम हैं और अपनी अस्तित्व रक्षा के लिए आपदधर्म की मजबूरी के उपाय हैं.
अब प्रश्न यह उठता है कि भ्रष्टाचार की बाढ़ 90 के दशक से क्यों फैल रही है. इसके दो कारण लगते हैं. एक तो हमने उदारीकरण और वैश्वीकरण की दिशा में मुड़कर विषमता व संपन्नता के सहअस्तित्व वाली अभावपूर्ण व्यवस्था को खुली छूट दे दी है. दूसरे, राजीव गांधी के सत्ता विकेंद्रीकरण संविधान संशोधन के बावजूद राजसत्ता के सूत्रधारों के हाथ में ताकत का केंद्रीकरण हुआ है. इसके परिणामस्वरूप सत्ता की सीढ़ियों पर चढ़ कर संपत्ति बटोरना बहुत आसान हो गया है. इसे रतन टाटा जैसे सम्मानित लक्ष्मी पुत्र ने ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ की संज्ञा दी है. अगर अभाव, विषमता, केंद्रीकरण और संपन्नता की एकजुटता भ्रष्टाचार के विषवृक्ष के लिए खाद का काम कर रही है, तो इसके निमरूलन के लिए इन्हीं चारों पहलुओं पर काम करने की जरूरत है. रोटी (खाद्य सुरक्षा) और रोजी (आजीविका सुरक्षा) के लिए आम लोगों को अवसर व साधन उपलब्ध कराना जरूरी हो चुका है. इसी के साथ पढ़ाई (शिक्षा का अधिकार) और दवा (स्वास्थ्य का अधिकार) को भी हमारे राष्ट्र निर्माण का बुनियादी तत्व बनना चाहिए. इसके साथ पानी, आवास की व्यवस्था, सामाजिक न्याय और आत्म सम्मान की सुरक्षा को जोड़ देने से करोड़ों लोगों को हम भ्रष्टाचार की हजारों छोटी-छोटी यातनाओं से बचा सकते हैं.
गत 65 वर्ष में कांग्रेस-गैर कांग्रेस, स्त्री-पुरुष, सवर्ण-अवर्ण, उत्तर-दक्षिण, पूरब-पश्चिम, एक दल-बहुदल, नेता-प्रोफेसर, हर तरह के नुस्खे आजमाये गये हैं. और हर परिवर्तन से भ्रष्टाचार का बुखार एक डिग्री ऊपर ही चढ़ता गया है, ऐसा क्यों?
Saturday, September 1, 2012
आरक्षण नहीं, जाति है समस्या
यह बहुत मासूम सा तर्क लगता है कि आरक्षण खत्म कीजिये, जाति अपने आप चली
जायेगी. यह तर्क कहीं भी टकरा सकता है. उच्चवर्ग में शामिल हो जाने के
सपने देखती मध्यवर्गीय आंखों में, अन्ना के आंदोलन में लहराते क्रांतिकारी
मनुवादी मोर्चे के झंडे में, कहीं भी. यह तर्क देने वाले ज्यादातर लोग सवर्ण वर्ग से आते हैं. यह तर्क देते हुए उनकी आवाज में अंतिम सच जान
चुके होने की आश्वस्ति होती है.
वे जानते हैं आरक्षण देश के विकास के लिए घातक है, योग्यता के खिलाफ है और अगर ठीक भी हो तो कैसे इसका लाभ जरूरतमंदों तक न पहुंच कर दलित-बहुजन वर्ग के अपने अभिजात वर्ग तक सिमट कर रह जाता है.
पर फिर यहीं एक सवाल बनता है कि इस तर्क की राजनीतिक और दर्शनशास्त्रीय अवस्थिति क्या है? विशुद्ध समाजवैज्ञानिक संदर्भो में देखें तो इस तर्क की वैधता और विश्वसनीयता है भी या नहीं, और है तो कितनी है? कार्य-कारण की सबसे भोथरी समझ के साथ भी देखते ही यह तर्क भरभरा कर ढह जाता है. ऐसे कि आरक्षण जाति के पहले नहीं, बाद में आता है. आरक्षण कारण नहीं परिणाम है. परिणाम भी ऐसा नहीं कि खुद ही से निकल आया हो. यह ऐसा परिणाम है, जो कारण के कुप्रभावों से पैदा हुए असंतोष से, प्रतिकार से निकला है.
उत्पीड़ित अस्मिताओं के संघर्षो के उफान वाले आज के दौर में सत्ता और संसाधनों पर काबिज वर्गो द्वारा यथास्थिति बनाये रखने के लिए तर्क गढ़े जा रहे हैं. बीते लंबे दौर से इस राजनीति का केंद्रीय कार्यभार ही रहा है कि समस्या को जाति से खिसका कर आरक्षण पर ला खड़ा किया जाये, और अगर नहीं भी हो सके तो आरक्षण को भी जाति के बराबर की ही समस्या तो बना ही दिया जाये. अपने इस प्रयास में वे काफी हद तक सफल भी हुए हैं.
आरक्षण जातिप्रथा के अंत के लिए न तो अंतिम विकल्प है, न सबसे कारगर. बाबासाहेब आंबेडकर के ही विचारों को याद करें तो जाति को खत्म करने का असली तरीका अंतरजातीय विवाह है, क्योंकि वे श्रेणीगत पहचानों में बंटे समाज में बंटवारे और ऊंच-नीच की मूल इकाई को ही ध्वस्त कर देंगे. पर जब तक ऐसा नहीं हो पा रहा है तब तक क्या करें? तब तक क्या जाति और आरक्षण दोनों को समस्या मान लें, जैसा कि प्रगतिशील खेमे के कुछ साथी करने लगे हैं?
आरक्षण को लेकर एक और सवाल है जो कुछ प्रगतिशीलों के दिमाग में भी खटकता है. यह सवाल है आरक्षण की तथाकथित अंतहीनता का. उन्हें लगता है कि आरक्षण सिर्फ दस सालों के लिए दिया गया था, फिर इसे अब तक क्यों बढ़ाया जा रहा है? दस साल का आरक्षण सिर्फ संसद में था, और वह भी अन्य शर्तो के साथ. नौकरियों में आरक्षण का सवाल उससे बहुत अलग है और यह एक तरफ तो संविधानप्रदत्त विभेदन को रोक समानता को बढ़ाने वाले मूल अधिकारों से निकलता है और दूसरी तरफ आर्थिक-सामाजिक रूप से पिछड़े तबकों के उत्थान के लिए प्रयास करने की उस जिम्मेदारी से, जिसके लिए संविधान के नीति निर्देशक सिद्धांतों के तहत राज्य वचनबद्ध है. फिर उस आरक्षण के साथ इसे जोड़ देना चूक नहीं साजिश है. इसके साथ एक और नुक्ता जुड़ता है, क्या सच में जातिगत विभेदन और उससे पैदा होने वाली गैरबराबरी खत्म हो गयी है और अब समस्या जाति नहीं आरक्षण है?
अब जरा अपने देश के निजी क्षेत्र पर नजर डालें, जहां अभी हाल में ही यूनिवर्सिटी ऑफ नॉर्थ ब्रिटिश कोलंबिया के डी अजित व अन्यों के अध्ययन में चौंकाने वाले आंकड़े मिले हैं. भारत की शीर्ष 1000 निजी कंपनियों के निदेशक बोर्ड में सवर्ण 93 प्रतिशत, ओबीसी 3.8 प्रतिशत और दलित 3.5 प्रतिशत हैं! इससे ज्यादा और कुछ कहने की शायद जरूरत नहीं होनी चाहिए. यही तर्क भी है आरक्षण के कम-से-कम तब तक जारी रखने का, जब तक कि भारतीय समाज बहुलवादी न हो जाये. आखिर किसी भी समाज के उत्थान की कोशिशों के लिए उसके अंदर एक खास वर्ग का होना जरूरी है.
आप चाहे उसे मध्यवर्ग कहें, या वामपंथ की भाषा में हरावल, जब तक रोज दिहाड़ी करके खाने की चिंता से मुक्त ऐसा वर्ग अस्मिताओं के अंदर पैदा नहीं होगा, उनके मुक्त होने की संभावना बहुत कम होगी. आरक्षण ने तमाम उत्पीड़ित अस्मिताओं के अंदर ऐसा ही वर्ग खड़ा करने में सफलता पायी है. आरक्षण लागू रखने के पीछे सबसे मजबूत तर्क बस यही है. और यह भी कि एक ऐसा वर्ग खड़ा हो जाने के बाद सामाजिक शक्ति-संबंधों में आने वाले बदलावों से जाति को बड़ा धक्का लगेगा और तब शायद आरक्षण की जरूरत ही न रह जाये.
वे जानते हैं आरक्षण देश के विकास के लिए घातक है, योग्यता के खिलाफ है और अगर ठीक भी हो तो कैसे इसका लाभ जरूरतमंदों तक न पहुंच कर दलित-बहुजन वर्ग के अपने अभिजात वर्ग तक सिमट कर रह जाता है.
पर फिर यहीं एक सवाल बनता है कि इस तर्क की राजनीतिक और दर्शनशास्त्रीय अवस्थिति क्या है? विशुद्ध समाजवैज्ञानिक संदर्भो में देखें तो इस तर्क की वैधता और विश्वसनीयता है भी या नहीं, और है तो कितनी है? कार्य-कारण की सबसे भोथरी समझ के साथ भी देखते ही यह तर्क भरभरा कर ढह जाता है. ऐसे कि आरक्षण जाति के पहले नहीं, बाद में आता है. आरक्षण कारण नहीं परिणाम है. परिणाम भी ऐसा नहीं कि खुद ही से निकल आया हो. यह ऐसा परिणाम है, जो कारण के कुप्रभावों से पैदा हुए असंतोष से, प्रतिकार से निकला है.
उत्पीड़ित अस्मिताओं के संघर्षो के उफान वाले आज के दौर में सत्ता और संसाधनों पर काबिज वर्गो द्वारा यथास्थिति बनाये रखने के लिए तर्क गढ़े जा रहे हैं. बीते लंबे दौर से इस राजनीति का केंद्रीय कार्यभार ही रहा है कि समस्या को जाति से खिसका कर आरक्षण पर ला खड़ा किया जाये, और अगर नहीं भी हो सके तो आरक्षण को भी जाति के बराबर की ही समस्या तो बना ही दिया जाये. अपने इस प्रयास में वे काफी हद तक सफल भी हुए हैं.
आरक्षण जातिप्रथा के अंत के लिए न तो अंतिम विकल्प है, न सबसे कारगर. बाबासाहेब आंबेडकर के ही विचारों को याद करें तो जाति को खत्म करने का असली तरीका अंतरजातीय विवाह है, क्योंकि वे श्रेणीगत पहचानों में बंटे समाज में बंटवारे और ऊंच-नीच की मूल इकाई को ही ध्वस्त कर देंगे. पर जब तक ऐसा नहीं हो पा रहा है तब तक क्या करें? तब तक क्या जाति और आरक्षण दोनों को समस्या मान लें, जैसा कि प्रगतिशील खेमे के कुछ साथी करने लगे हैं?
आरक्षण को लेकर एक और सवाल है जो कुछ प्रगतिशीलों के दिमाग में भी खटकता है. यह सवाल है आरक्षण की तथाकथित अंतहीनता का. उन्हें लगता है कि आरक्षण सिर्फ दस सालों के लिए दिया गया था, फिर इसे अब तक क्यों बढ़ाया जा रहा है? दस साल का आरक्षण सिर्फ संसद में था, और वह भी अन्य शर्तो के साथ. नौकरियों में आरक्षण का सवाल उससे बहुत अलग है और यह एक तरफ तो संविधानप्रदत्त विभेदन को रोक समानता को बढ़ाने वाले मूल अधिकारों से निकलता है और दूसरी तरफ आर्थिक-सामाजिक रूप से पिछड़े तबकों के उत्थान के लिए प्रयास करने की उस जिम्मेदारी से, जिसके लिए संविधान के नीति निर्देशक सिद्धांतों के तहत राज्य वचनबद्ध है. फिर उस आरक्षण के साथ इसे जोड़ देना चूक नहीं साजिश है. इसके साथ एक और नुक्ता जुड़ता है, क्या सच में जातिगत विभेदन और उससे पैदा होने वाली गैरबराबरी खत्म हो गयी है और अब समस्या जाति नहीं आरक्षण है?
अब जरा अपने देश के निजी क्षेत्र पर नजर डालें, जहां अभी हाल में ही यूनिवर्सिटी ऑफ नॉर्थ ब्रिटिश कोलंबिया के डी अजित व अन्यों के अध्ययन में चौंकाने वाले आंकड़े मिले हैं. भारत की शीर्ष 1000 निजी कंपनियों के निदेशक बोर्ड में सवर्ण 93 प्रतिशत, ओबीसी 3.8 प्रतिशत और दलित 3.5 प्रतिशत हैं! इससे ज्यादा और कुछ कहने की शायद जरूरत नहीं होनी चाहिए. यही तर्क भी है आरक्षण के कम-से-कम तब तक जारी रखने का, जब तक कि भारतीय समाज बहुलवादी न हो जाये. आखिर किसी भी समाज के उत्थान की कोशिशों के लिए उसके अंदर एक खास वर्ग का होना जरूरी है.
आप चाहे उसे मध्यवर्ग कहें, या वामपंथ की भाषा में हरावल, जब तक रोज दिहाड़ी करके खाने की चिंता से मुक्त ऐसा वर्ग अस्मिताओं के अंदर पैदा नहीं होगा, उनके मुक्त होने की संभावना बहुत कम होगी. आरक्षण ने तमाम उत्पीड़ित अस्मिताओं के अंदर ऐसा ही वर्ग खड़ा करने में सफलता पायी है. आरक्षण लागू रखने के पीछे सबसे मजबूत तर्क बस यही है. और यह भी कि एक ऐसा वर्ग खड़ा हो जाने के बाद सामाजिक शक्ति-संबंधों में आने वाले बदलावों से जाति को बड़ा धक्का लगेगा और तब शायद आरक्षण की जरूरत ही न रह जाये.
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