Tuesday, March 12, 2013

डॉ. अम्बेडकर और महात्मा गांधी



डाक्टर भीमराव अम्बेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को महाराष्ट्र के एक महार परिवार में हुआ था। 1907 में मैट्रिकुलेशन पास करने के बाद बड़ौदा महाराज की आर्थिक सहायता से वे एलिफिन्सटन कॉलेज से 1912 में ग्रेजुएट हुए। कुछ साल बड़ौदा राज्य की सेवा करने के बाद उनको गायकवाड़-स्कालरशिप प्रदान किया गया जिसके सहारे उन्होंने अमेरिका के कोलम्बिया विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में एम.ए. (1915) किया। इसी क्रम में वे प्रसिध्द अमेरिकी अर्थशास्त्री सेलिगमैन के प्रभाव में आए। सेलिगमैन के मार्गदर्शन में उन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय से 1917 में पीएच. डी. की उपाधी प्राप्त कर ली। उनके शोध का विषय था - नेशनल डेवलेपमेंट फॉर इंडिया : ए हिस्टोरिकल एंड एनालिटिकल स्टडी। इसी वर्ष उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स में दाखिला लिया लेकिन साधनाभाव में अपनी शिक्षा पूरी नहीं कर पाए। कुछ दिनों तक वे बड़ौदा राज्य के मिलिटरी सेक्रेटरी थे। फिर वे बड़ौदा से बम्बई आ गए। कुछ दिनों तक वे सिडेनहैम कॉलेज, बम्बई में राजनीतिक अर्थशास्त्र के प्रोफेसर भी रहे। डिप्रेस्ड क्लासेज कांफरेंस से भी जुड़े और सक्रिय राजनीति में भागीदारी शुरू की। कुछ समय बाद उन्होंने लंदन जाकर लंदन स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स से अपनी अधूरी पढ़ाई पूरी की। इस तरह विपरीत परिस्थिति में पैदा होने के बावजूद अपनी लगन और कर्मठता से उन्होंने एम.ए., पी एच. डी., एम. एस. सी., बार-एट-लॉ की डिग्रियां प्राप्त की। इस तरह से वे अपने युग के सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे राजनेता एवं विचारक थे। उनको आधुनिक पश्चिमी  समाजों की संरचना की समाज-विज्ञान, अर्थशास्त्र एवं कानूनी दृष्टि से व्यवस्थित ज्ञान था। वे विदेशों के परिवेश तथा मान्यताओं को पूर्ण रूप से समझते थे, किन्तु उन्होंने अपने कार्यों एवं रचनाओं के द्वारा जिस विचारधारा का प्रचार-प्रसार किया उसकी संरचना में सबसे अधिक भाग भारत की तत्कालीन परिस्थिति में उनके अपने अनुभवों, विवेक एवं दूरदर्शिता की थी। महात्मा गांधी और देंग शियाओ पिंग की तरह डा. अम्बेडकर भी एक रणनीतिक विचारक थे और समय-समय पर आवश्यकता के अनुसार अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अपने विचारों एवं सरोकारों को पिछले अनुभवों के आधार पर संशोधित एवं परिमार्जित भी किया। लेकिन शुरू से अंत तक  उनका लक्ष्य एवं उनके चिंतन की मूल धारा में निरंतरता बनी रही। 1920 के दशक में बंबई में एक बार बोलते हुए उन्होंने साफ-साफ कहा था ''जहाँ मेरे व्यक्तिगत हित और देशहित में टकराव होगा वहाँ मैं देश के हित को प्राथमिकता दूँगा, लेकिन जहाँ दलित जातियों के हित और देश के हित में टकराव होगा, वहाँ मैं दलित जातियों को प्राथमिकता दूँगा।'' वे अंतिम समय तक दलित-वर्ग के मसीहा थे और उन्होंने जीवनपर्यंत अछूतोद्वार के लिए कार्य किया। जब गांधी ने दलितों को अल्पसंख्यकों की तरह पृथक निर्वाचन मंडल देने के ब्रिटिश नीति के खिलाफ आमरण अनशन किया तो शुरू में डा. अम्बेडकर ने कहा ''महात्मा कोई अमर व्यक्ति नहीं है, और न कांग्रेस ही अमर है। बहुत से महात्मा आये और चले गये। लेकिन अछूत अछूत ही बने रहे।'' लेकिन जब आमरण अनशन के कारण सचमुच महात्मा गांधी के जीवन पर खतरा मंडराने लगा तो देश के हित के लिए डा. अम्बेडकर ने महात्मा गांधी के साथ पूना-पैक्ट (1932) किया। और स्वतंत्रता मिलने के बाद संविधान सभा के प्रारूप समिति के अध्यक्ष एवं भारत के प्रथम कानून मंत्री के रूप में डा. अम्बेडकर का चुनाव महात्मा गांधी की प्रेरणा से ही हुआ था। भारतीय संविधान में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए आरक्षण के बारे में सैद्वांतिक सहमति गांधी-अम्बेडकर के पूना पैक्ट के दौरान ही हो गई थी। महात्मा गांधी पाकिस्तान की तरह दलितिस्तान की संभावना के कारण पृथक निर्वाचन मंडल के खिलाफ थे लेकिन अछूतोध्दार की हर उस कोशिश के पक्ष में थे जो अहिंसा एवं सत्य के साथ सर्वोदय के उनके आदर्श के खिलाफ न हो। दलितों और जनजातियों को मुख्यधारा में लाने के लिए कानूनी संरक्षण या आरक्षण के बारे में गांधीजी और डा. अम्बेडकर के विचारों में 1932 के बाद सैद्वांतिक विरोध की जगह पूरकता ज्यादा दिखती है।


     महात्मा गांधी अछूतोध्दार के लिए सवर्ण हिन्दुओं के हृदयपरिवर्तन के लिए वैष्णव धर्म और भक्ति आंदोलन की सभ्यतामूलक चेतना में जैन दर्शन के अनेकांतवाद से भी प्रभावित थे। उनका मानना था कि अछूतों की कुछ समस्यायें तो सवर्ण हिन्दुओं की अशिक्षा के कारण पैदा हुई है लेकिन उनकी कुछ समस्यायें हर समुदाय के किसानों, श्रमिकों एवं शिल्पकारों की समस्या है जो उपनिवेशवादी गुलामी के कारण पैदा हुई है। इसके निवारण के लिए महात्मा गांधी ने बुनियादी शिक्षा, ग्राम स्वराज, सर्वोदय और आत्म-परिष्कार की वकालत किया। महात्मा गांधी समाज की समस्या को समाज के लोगों (जिसे वे लोक कहते थे) के स्तर पर आपसी सद्भाव से हल करने के पक्ष में थे। वे राज्य की बहुत सीमित भूमिका देखते थे। आधुनिक विधि व्यवस्था, संसद, पुलिस-स्टेशन आदि पर उनको ज्यादा भरोसा नहीं था। दुर्खीम के गिल्ड-समाजवाद को ही वे सर्वोदय के नाम से भारतीय समस्याओं के समाधान के लिए प्रस्तुत कर रहे थे। गांधीजी के प्रति अपार आदर के बावजूद कांग्रेस की सरकार गांधीजी की विचारधारा पर नहीं चल पायी। जवाहरलाल नेहरू आधुनिक पश्चिम की औद्योगिक व्यवस्था के तहत मार्क्सवाद से प्रभावित प्रजातांत्रिक समाजवाद के समर्थक थे।


     महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के विपरीत डा. अम्बेडकर समाजवादी नहीं थे। उनकी शिक्षा अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स में हुई थी। वे मार्क्सवादी समाजवाद के स्थान पर पश्चिमी यूरोप और अमेरिका में प्रचलित प्रजातांत्रिक पूँजीवादी व्यवस्था के तहत ही बौद्व धर्म 'बहुजन हिताय और बहुजन सुखाय' वाले आदर्श समाज के निर्माण के पक्षधर थे जिसमें हर व्यक्ति एक दूसरे के समान होगा। फ्रांसीसी क्रांति के नारे स्वतंत्रता, समानता और भातृत्व की भावना को वे भगवान बुध्द, महात्मा कबीर और महात्मा ज्योतिबा के चिंतन का भी केन्द्रीय सरोकार मानते हैं। वे अक्सर कहा करते थे कि यह सुखद संयोग है कि फ्रांसीसी क्रांति के नेताओं को भी भारतीय मनीषियों की तरह सभ्य समाज के लिए स्वतंत्रता, समानता और भ्रातृत्व की विचारधारा उतनी ही आवश्यक लगती थी।


     आधुनिक विधि व्यवस्था, संसद और आधुनिक शिक्षा में उनकी गहरी आस्था थी। वे अधिकांशत: पश्चिमी अभिजन की शैली में कोट-पैंट और टाई लगाते थे। उनकी स्पष्ट मान्यता थी कि दलितों को न सिर्फ ऊँची शिक्षा हासिल करनी चाहिए बल्कि सत्ता संचालन में प्रत्यक्ष भागीदारी करनी चाहिए। बिना राजनैतिक-आर्थिक शक्ति और ज्ञान प्राप्त किये दलितों और अछूतों के लिए उन्नति के सारे मार्ग बंद हैं। अत: उन्होंने अपने अनुयायियों को आपस में राजनैतिक रूप से संगठित होकर सत्ता में प्रत्यक्ष भागीदारी के लिए प्रेरित किया। 1920 से 1956 तक पूरे जीवन वे दलितों को राजनैतिक रूप से संगठित होकर सत्ता में प्रत्यक्ष भागीदारी के लिए विभिन्न मंचों पर सक्रिय रहे। लेकिन अपने जीवन में राजनैतिक स्तर पर अपने दल रिपब्लिकन पार्टी को उतनी सफलता नहीं दिला पाये। लेकिन कालांतर में उनके विचारों से प्रेरित दलित आंदोलन से कांसीराम और मायावती के नेतृत्व में बहुजन समाज पार्टी का विकास हुआ जिसने 1980 के दशक से उत्तर प्रदेश की राजनीति में पहले दलित वोटों को गोलबंद करने में सफलता पायी फिर गठबंधन की राजनीति के दौर में 1993 से सत्ता में प्रत्यक्ष भागीदारी पाना शुरू किया। 1995 से अब तक मायावती उत्तर प्रदेश की चार बार मुख्यमंत्री बन चुकी हैं और उत्तर भारत के अन्य राज्यों में भी बहुजन समाज पार्टी का विस्तार हो रहा है। अब दलितों को अछूत कहना तो दूर उनके नेतृत्व में राजनीतिक गठबंधन बनाने की होड़ सवर्ण जातियों में आम बात हो गई है।


  शिक्षण केन्द्रों, नौकरियों, विधान सभा और लोक सभा में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए 1952 से आरक्षण लागू करवा लेना डा. अम्बेडकर के लिए बड़ी उपलब्धी मानी जाती है। दलित, आदिवासियों और स्त्रियों के अधिकारों के रक्षा के लिए भी डा. अम्बेडकर ने कई कानून बनवाया। उनकी प्रेरणा से अनुसूचित जाति आयोग भी बना।


     महात्मा गांधी के विपरीत डा. अम्बेडकर गांवों की अपेक्षा नगरों में एवं ग्रामीण शिल्पों या कृषि की व्यवस्था की तुलना में पश्चिमी समाज की औद्योगिक विकास में भारत और दलितों का भविष्य देखते थे। वे मार्क्सवादी समाजवाद की तुलना में बौध्द मानववाद के समर्थक थे जिसके केन्द्र में व्यक्तिगत स्वतंत्रता, समानता एवं भ्रातृत्व की भावना है।

Wednesday, December 26, 2012

अस्मिता की लड़ाई

दिल्ली गैंगरेप के विरोध में लोगों का गुस्सा चौतरफा देखा जा रहा है. लोग बात कर रहे हैं कि लड़कियों-स्त्रियों की सुरक्षा के मुद्दे का स्थायी समाधान किस तरह निकले. 1970 के दशक के उत्तरार्ध में मथुरा बलात्कार कांड के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय का जो फैसला आया था, उसके बाद जिस तरह देशव्यापी प्रदर्शन हुए थे और सरकार को बलात्कार संबंधी कानून में बदलाव करना पड़ा था, उसी किस्म का वातावरण इस वक्त बन गया है.

बलात्कार की घटना के बाद अकसर पीड़िता को ही दोषी ठहराने की हमारे समाज में एक रीति है, जिसमें उसे ही आधुनिक कपड़े पहनने से लेकर अकेले सड़क पर चलने को लेकर उलाहना दी जाती है. लेकिन इसके विपरीत इस बार एक सकारात्मक बात दिख रही है, लोग खुद कह रहे हैं कि सुरक्षा के लिए हम अपनी लड़कियों को घर में कैद नहीं कर सकते, न ही हर सार्वजनिक स्थल पर या लड़की जहां जाये वहां परिवारवालों की निगरानी में रख सकते हैं. आखिर लड़की होने का खामियाजा वे कबतक भुगतती रहेंगी, इसलिए सुरक्षित समाज तो उन्हें चाहिए ही.

सवाल पहले सरकार से है कि आखिर घटना घट जाने के बाद सख्ती की याद क्यों आती है? अब तक कानूनों को सख्त बना कर उस पर अमल क्यों नहीं हुआ? फास्ट ट्रैक कोर्ट को नीतिगत स्तर पर स्वीकृति मिलने के बाद भी वह क्यों नहीं बन सका? इस घटना से उपजे जनाक्रोश के दबाव में अब दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने हाइकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिख कर अनुरोध किया है कि वे दिल्ली में फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने की प्रक्रिया को तेज करें. गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने भी संसद के पटल पर कहा कि वह सुनिश्चित करेंगे कि उपरोक्त मामले की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में हो.

सरकार अगर इच्छाशक्ति दिखाये तो जल्द सुनवाई और अपराधियों को कड़ी सजा संभव है. इसका उदाहरण राजस्थान में मिला है, जहां एक विदेशी पर्यटक के साथ हुए यौन अत्याचार के मामले में घटना के महज 15 दिन के अंदर सारी सुनवाई पूरी कर ली गयी थी और आरोपियों को सजा सुनायी गयी थी. ऐसी त्वरित कार्रवाई अन्य सभी मामलों में क्यों संभव नहीं है, ताकि बलात्कार पीड़िता का न्याय व्यवस्था पर भरोसा बन सके और वह मामले को भूल कर जिंदगी में एक नया पन्ना पलट सके. आम तौर पर यही देखने में आता है कि कभी न्यायालयों में लंबित मामलों की अधिक संख्या के नाम पर, तो कभी मामले की जांच में पुलिस द्वारा बरती जानेवाली लापरवाही एवं विलंब के नाम पर फैसला आने में सालों

Sunday, November 25, 2012

राज्य मद्द निषेध दिवस मनाया गया


माद्द निषेध दिवस के अवसर पर नेहरु युवा केंद्र के तत्वावधान में अम्बेडकर क्लब मधुकरचक के द्वारा नुक्कड़ नाटक एवं प्रभात फेरी का कार्यक्रम क्लब के अध्यक्ष कुमार दीनबन्धु  के नेतृत्व में किया गया . कार्यक्रम द्वारा ग्रामीण नवयुवकों में बढ़ती नशाखोरी एवं इसके  कुप्रभावों पर   चिंता व्यक्त किया गया , साथ ही नशाखोरी से बचने के उपायों को नाटक मंचन के द्वारा दिखया गया .कार्यक्रम में सचिव दिलीप कुमार , सदस्यों रमण ,संजीव ,मनीष ,दीपक ,मिथिलेश , गौरव , बैद्द्नाथ ,निर्भय आदि उपस्थित  जबकि उपस्थित ग्रामीणों में पूर्व मुखिया  नागेश्वर यादव , भादो शर्मा , कैलाश मंडल , शिवन रजक , सुधीर यादव आदि के  द्वारा क्लब के समाज सुधार कार्यक्रम को सराहनीय बताया गया .
                 
                                                            विदित हो की अम्बेडकर क्लब मधुकरचक एक स्वयंसेवी सामाजिक संस्था के रूप में पिछले 14 वर्षों से वृहत उद्देश्य लिए  कार्य कर रही है  . इसके कार्यक्षेत्रों में निरक्षरता उन्मूलन , पर्यावरण संरक्षण , स्वास्थ्य एवं पोषण , स्वरोजगार प्रोत्साहन , लैंगिक समानता , रूढ़िवादी एवं अन्धविश्वासी परम्पराओं का उन्मूलन , दलित उत्थान , गंभीर रोग निरोधक उपाय जैसे कई समाज सुधार के क्षेत्रों को शामिल किया गया है . लेकिन सरकारी सहायता नहीं मिलने के कारण भारत सरकार के  खेल एवं युवा मंत्रालय के नेहरु युवा केंद्र से पंजीकृत यह क्लब अपने उद्देश्यों को पाने में संघर्ष कर रहा है .  सीमित संसाधनों के बावजूद यह क्लब अपनी स्वयं की रफ़्तार से कार्य कर रहा है .

Monday, November 19, 2012

छठ पर्व की आस्था एवं ऐतिहासिकता

छठ लोकपर्व है. इसके साथ लोगों की गहरी आस्था जुड़ी है. इसमें कोई छोटा-बड़ा नहीं है, सभी के लिए यह एक जैसा है. छठ किसी जाति या समुदाय से बंधा हुआ नहीं है. यही एक ऐसा पर्व है, जिसमें किसी पुरोहित की जरूरत नहीं पड़ती. प्रकृति की पूजा के इस पर्व की खासियत तो देखिये, लोग उगते सूर्य की बजाय डूबते यानी अस्ताचलगामी सूर्य को पहले अर्घ देते हैं. छठ के दौरान सूर्य और छठी मइया (पार्वती), दोनों की पूजा होती है.


उदारीकरण के दौर में लगभग सभी पर्व-त्योहारों को बाजार ने अपनी गिरफ्त में ले लिया है. होली, दशहरा, दीपावली- सभी पर बाजार ने किसी न किसी रूप में प्रभाव डाला है. फिर चाहे वह रंग-बिरंगी पिचकारी हो या सजावटी दीये व बल्ब, बाजार का डंका हर जगह बज रहा है. लेकिन, छठ पर्व के आगे बाजार की अब तक नहीं चल पायी है. प्रकृति के इस पर्व में आज भी सब कुछ प्राकृतिक ही है. इतना ही नहीं, लगभग सभी पर्व-त्योहारों पर अपसंस्कृति भी हावी होती दिखायी देती है, लेकिन छठ इससे भी बचा हुआ है. सबसे मजेदार बात यह है कि दशहरा में जो युवक चंदा लेने के लिए हुड़दंग मचाते हैं, जोर-जबरदस्ती करते हैं, छठ आते ही व्यवस्थापक बन जाते हैं, कुछ लेने के बदले, देने के लिए तैयार हो जाते हैं. उनके मन में डर होता है कि छठ पूजन के दौरान अगर कुछ गलत करेंगे तो उसका गंभीर दंड मिलेगा और यदि अच्छा काम करेंगे तो काफी कुछ अच्छा होगा.
छठ की धार्मिक महत्ता बहुत अधिक है. पुराणों में भी छठ का वर्णन मिलता है. खास कर स्कंद और भविष्य पुराण में. इतिहास और अन्य धार्मिक ग्रंथों में भी इसकी चर्चा है. 1111 ई से 1155 ई तक गहड़वाल वंश के राजा थे गोविंद चंद्र. वे बहुत शक्तिशाली थे. आधा उत्तर प्रदेश यानी कन्नौज से लेकर पूरे बिहार तक उनका शासन था. उनके मंत्री थे लक्ष्मीधर. उन्होंने एक पुस्तक लिखी है ‘कृत्य कल्प तरू’. इसके अध्याय ‘व्रत विवेचन कांड’ में छठ का वर्णन है. कहा गया है कि कार्तिक शुक्ल षष्ठी को स्कंद माता (पार्वती) के पुत्र स्कंद यानी कार्तिकेय का जन्म हुआ और लोग उनके जन्मोत्सव को छठ के रूप में मनाने लगे. इस पर्व के दौरान महिलाएं जो गीत गाती हैं, उससे भी लगता है कि यह पुत्र प्राप्ति के लिए किया जानेवाला विशेष पर्व है. वैसे भी यह किताब (कृत्य कल्प तरू) करीब नौ सौ साल पहले लिखी गयी थी और कोई भी पर्व अचानक किसी किताब का हिस्सा नहीं बन सकता. कम-से-कम पांच सौ साल तो लग ही जाते हैं. इस हिसाब से छठ का इतिहास करीब डेढ़ हजार साल पुराना माना जा सकता है. मिथिला के पंडितों ने भी छठ पूजा का वर्णन अपनी रचनाओं में किया है. 14वीं सदी के आरंभ में राजा हरि सिंह के मंत्री थे पंडित चंदेश्वर. उन्होंने अपनी पुस्तक ‘कृत्य रत्नाकर’ में स्कंद जन्मोत्सव की चर्चा की है. इसी तरह पंडित रूद्रधर ने अपनी रचना ‘कृत्य वर्ष’ में सूर्य पूजा का वर्णन किया है.


वैसे वैदिक काल में भी छठ पूजा की बात आयी है. पंच देवता के रूप में पहली गणना सूर्य की ही होती है. ये हैं- सूर्य, विष्णु, शिव, पार्वती और गणोश. गायत्री मंत्र ‘ऊं भूर्भव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य: धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्’ वास्तव में सूर्य की ही स्तुति है और इस मंत्र के रचयिता है विश्वामित्र. इस तरह सूर्य की पूजा वैदिक काल से होती आ रही है. हां, यह सच है कि हर भगवान की पूजा समय खंड में बदलती रही है, जैसे आजकल हनुमान जी की पूजा करनेवाले बढ़ गये हैं, लेकिन सूर्य के प्रति श्रद्धा कभी कम नहीं हुई. छठ इसका सबसे अच्छा प्रमाण है.


बिहार में तो छठ को राज्य पर्व का दर्जा प्राप्त है. बिहारियों का यह सबसे बड़ा पर्व है. शायद ही कोई बिहारी छठ पूजा में शरीक नहीं होता होगा. अब तो छठ लोकल से ग्लोबल होता जा रहा है. जहां-जहां भी बिहारी रह रहे हैं, वहां-वहां छठ हो रहा है. फिर चाहे वे महाराष्ट्र, दिल्ली, पंजाब जैसे राज्य हों या फिजी, मॉरीशस जैसे देश, हर जगह छठ पर्व का आयोजन काफी धूमधाम से होने लगा है. अब तो बिहार सरकार की तरह दूसरी कई राज्य सरकारें भी छठ पर छुट्टी की घोषणा करने लगी हैं. बिहार से बाहर भी देश के कई प्रमुख शहरों में वहां की सरकार और राजनीतिक दल छठ को लेकर नदियों के किनारे विशेष व्यवस्थाएं करने लगे हैं. हालांकि इसके पीछे बिहारियों की बड़ी जमात को गोलबंद कर राजनीतिक लाभ लेने की भावना हो सकती है. लेकिन इस बहाने बिहारी अस्मिता को अब सम्मान भी मिलने लगा है. दूसरे राज्यों में छुट्टी की घोषणा होना बताता है कि उनके लिए बिहारी अब महत्वपूर्ण हैं, उनकी और उपेक्षा नहीं की जा सकती.

 यदि अपने क्षेत्र बिहारीगंज की बात की जाय तो छठ  में यहाँ की छटा देखते ही बनती है . शिवालय स्थित तालाब में स्थानीय विधायिका रेणु कुमारी के कोष से  44 लाख रुपये की राशि से निर्मित घाट की सुन्दरता देखते ही बनती है .

Saturday, October 27, 2012

रोजगार के अवसर

 राज्य सरकार  द्वारा जीविका प्रोत्साहन योजना के अंतर्गत सामुदायिक समन्वयक एवं क्षेत्रीय समन्वयक के पदों पर ऑनलाइन  आवेदन मांगे जा रहें हैं ! अधिक जानकारी के लिए  नीचे लिखे लिंक पर क्लिक  करें -

                                                     


                                                                         http://jobs.brlps.in

भ्रष्टाचारमुक्त भारत की शर्ते


पिछले कुछ अरसे से देशभर में भ्रष्टाचारी ताकतों से मुक्ति के लिए बेचैनी का बढ़ना स्वागत की बात है. लेकिन भ्रष्टाचार से मुक्ति को लेकर जनमानस और जानकार तीन समूहों में बंट गये लगते हैं. पहला समूह ऐसे उत्साही और सक्रिय आदर्शवादियों का है, जो यह मानते हैं कि भ्रष्टाचार का मूल आधार संपन्न वर्गो, अफसरों और नेताओं की तिकड़ी है. इनको काबू में लाने वाले नियमों व कानूनों से हम भ्रष्टाचार मुक्त भारत बना सकते हैं.


दूसरा समूह ऐसे मध्यमार्गियों का है, जिनका मानना है कि भ्रष्टाचार की जड़ें मनुष्य की कुछ बुनियादी कमजोरियों में हैं. जैसे लोभ, भोगवासना, सत्ता की भूख आदि. इसीलिए भ्रष्टाचार का निमरूलन तो आदर्श स्थिति में ही संभव है. हमारे दैनिक जीवन में इसको निगरानी और नियंत्रण से कम किया जा सकता है और करना भी चाहिए. एक तीसरा समूह ऐसे लोगों का है, जिनकी दृष्टि में भ्रष्टाचार, संपत्ति और मुनाफे को आदर देने वाली पूंजीवादी व्यवस्था का अनिवार्य अंग है. इसमें मत्स्य न्याय ही चलता है. इसीलिए भ्रष्टाचार की चर्चा हमारा ध्यान कुछ बड़ी समस्याओं, जैसे- शोषण, विषमता और गरीबी, से हटाने की दोषी है. भ्रष्टाचार से लड़ना आग बुझाने की बजाय धुएं की शिकायत करना है.


इनमें से तीनों दृष्टियां आंशिक सत्य पर आधारित हैं. इनको मानने वालों को यह याद दिलाना प्रासंगिक होगा कि हमारा समाज शुभ व अशुभ शक्तियों के बीच खुली और छिपी टकराहट से ही आगे बढ़ता या पीछे फिसलता है. आज हमें सार्वजनिक जीवन में राष्ट्रहित की कीमत पर भ्रष्टाचार के बारे में चुप्पी रखने का अवकाश नहीं है, क्योंकि भ्रष्टाचारियों की छल-कपट से न सिर्फ विकासधारा अवरुद्ध है, बल्कि विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की तमाम संस्थाओं की जड़ें कमजोर हो रही हैं. अब भ्रष्टाचार का बढ़ना जन हितकारी लोकतंत्र की जड़ें कमजोर करना हो चुका है. इसीलिए इस देश को सक्रिय नागरिक हस्तक्षेप और रचनात्मक राजनीतिक सहमति की जरू रत है.


भ्रष्टाचार की चर्चा में यह दोष फैल चुका है कि कौन भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलने का अधिकारी बचा है? मेरी समझ से इससे बड़ी नासमझी का कोई बयान नहीं हो सकता कि ‘हम सभी जिंदगी की जद्दोजहद में अपनी औकात व जरूरत के मुताबिक भ्रष्टाचार करने की प्रवृत्ति रखते हैं. फर्क मात्र और अनुपात का ही है. कोई खीरा चोर तो कोई हीरा चोर. पूरा समाज किसी न किसी स्तर पर दोषी है.’ असल में भ्रष्टाचार सार्वजनिक पद का निजीहित के लिए दुरुपयोग करना है. इसमें किसी सरकारी प्रमाणपत्र के लिए तहसील के बाबू को दस्तूरी देने या अस्पताल में इलाज के लिए नेता से डॉक्टर की पैरवी कराने को शामिल नहीं किया जा सकता. यह सब हमारी व्यवस्था संचालन के दोषों के परिणाम हैं और अपनी अस्तित्व रक्षा के लिए आपदधर्म की मजबूरी के उपाय हैं.


अब प्रश्न यह उठता है कि भ्रष्टाचार की बाढ़ 90 के दशक से क्यों फैल रही है. इसके दो कारण लगते हैं. एक तो हमने उदारीकरण और वैश्वीकरण की दिशा में मुड़कर विषमता व संपन्नता के सहअस्तित्व वाली अभावपूर्ण व्यवस्था को खुली छूट दे दी है. दूसरे, राजीव गांधी के सत्ता विकेंद्रीकरण संविधान संशोधन के बावजूद राजसत्ता के सूत्रधारों के हाथ में ताकत का केंद्रीकरण हुआ है. इसके परिणामस्वरूप सत्ता की सीढ़ियों पर चढ़ कर संपत्ति बटोरना बहुत आसान हो गया है. इसे रतन टाटा जैसे सम्मानित लक्ष्मी पुत्र ने ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ की संज्ञा दी है. अगर अभाव, विषमता, केंद्रीकरण और संपन्नता की एकजुटता भ्रष्टाचार के विषवृक्ष के लिए खाद का काम कर रही है, तो इसके निमरूलन के लिए इन्हीं चारों पहलुओं पर काम करने की जरूरत है. रोटी (खाद्य सुरक्षा) और रोजी (आजीविका सुरक्षा) के लिए आम लोगों को अवसर व साधन उपलब्ध कराना जरूरी हो चुका है. इसी के साथ पढ़ाई (शिक्षा का अधिकार) और दवा (स्वास्थ्य का अधिकार) को भी हमारे राष्ट्र निर्माण का बुनियादी तत्व बनना चाहिए. इसके साथ पानी, आवास की व्यवस्था, सामाजिक न्याय और आत्म सम्मान की सुरक्षा को जोड़ देने से करोड़ों लोगों को हम भ्रष्टाचार की हजारों छोटी-छोटी यातनाओं से बचा सकते हैं.


गत 65 वर्ष में कांग्रेस-गैर कांग्रेस, स्त्री-पुरुष, सवर्ण-अवर्ण, उत्तर-दक्षिण, पूरब-पश्चिम, एक दल-बहुदल, नेता-प्रोफेसर, हर तरह के नुस्खे आजमाये गये हैं. और हर परिवर्तन से भ्रष्टाचार का बुखार एक डिग्री ऊपर ही चढ़ता गया है, ऐसा क्यों?