Saturday, September 1, 2012

आरक्षण नहीं, जाति है समस्या

यह बहुत मासूम सा तर्क लगता है कि आरक्षण खत्म कीजिये, जाति अपने आप चली जायेगी. यह तर्क कहीं भी टकरा सकता है. उच्चवर्ग में शामिल हो जाने के सपने देखती मध्यवर्गीय आंखों में, अन्ना के आंदोलन में लहराते क्रांतिकारी मनुवादी मोर्चे के झंडे में, कहीं भी. यह तर्क देने वाले ज्यादातर लोग सवर्ण  वर्ग से आते हैं. यह तर्क देते हुए उनकी आवाज में अंतिम सच जान चुके होने की आश्वस्ति होती है.
वे जानते हैं आरक्षण देश के विकास के लिए घातक है, योग्यता के खिलाफ है और अगर ठीक भी हो तो कैसे इसका लाभ जरूरतमंदों तक न पहुंच कर दलित-बहुजन वर्ग के अपने अभिजात वर्ग तक सिमट कर रह जाता है.

पर फिर यहीं एक सवाल बनता है कि इस तर्क की राजनीतिक और दर्शनशास्त्रीय अवस्थिति क्या है? विशुद्ध समाजवैज्ञानिक संदर्भो में देखें तो इस तर्क की वैधता और विश्वसनीयता है भी या नहीं, और है तो कितनी है? कार्य-कारण की सबसे भोथरी समझ के साथ भी देखते ही यह तर्क भरभरा कर ढह जाता है. ऐसे कि आरक्षण जाति के पहले नहीं, बाद में आता है. आरक्षण कारण नहीं परिणाम है. परिणाम भी ऐसा नहीं कि खुद ही से निकल आया हो. यह ऐसा परिणाम है, जो कारण के कुप्रभावों से पैदा हुए असंतोष से, प्रतिकार से निकला है.
उत्पीड़ित अस्मिताओं के संघर्षो के उफान वाले आज के दौर में सत्ता और संसाधनों पर काबिज वर्गो द्वारा यथास्थिति बनाये रखने के लिए तर्क गढ़े जा रहे हैं. बीते लंबे दौर से इस राजनीति का केंद्रीय कार्यभार ही रहा है कि समस्या को जाति से खिसका कर आरक्षण पर ला खड़ा किया जाये, और अगर नहीं भी हो सके तो आरक्षण को भी जाति के बराबर की ही समस्या तो बना ही दिया जाये. अपने इस प्रयास में वे काफी हद तक सफल भी हुए हैं.

आरक्षण जातिप्रथा के अंत के लिए न तो अंतिम विकल्प है, न सबसे कारगर. बाबासाहेब आंबेडकर के ही विचारों को याद करें तो जाति को खत्म करने का असली तरीका अंतरजातीय विवाह है, क्योंकि वे श्रेणीगत पहचानों में बंटे समाज में बंटवारे और ऊंच-नीच की मूल इकाई को ही ध्वस्त कर देंगे. पर जब तक ऐसा नहीं हो पा रहा है तब तक क्या करें? तब तक क्या जाति और आरक्षण दोनों को समस्या मान लें, जैसा कि प्रगतिशील खेमे के कुछ साथी करने लगे हैं?

आरक्षण को लेकर एक और सवाल है जो कुछ प्रगतिशीलों के दिमाग में भी खटकता है. यह सवाल है आरक्षण की तथाकथित अंतहीनता का. उन्हें लगता है कि आरक्षण सिर्फ दस सालों के लिए दिया गया था, फिर इसे अब तक क्यों बढ़ाया जा रहा है? दस साल का आरक्षण सिर्फ संसद में था, और वह भी अन्य शर्तो के साथ. नौकरियों में आरक्षण का सवाल उससे बहुत अलग है और यह एक तरफ तो संविधानप्रदत्त विभेदन को रोक समानता को बढ़ाने वाले मूल अधिकारों से निकलता है और दूसरी तरफ आर्थिक-सामाजिक रूप से पिछड़े तबकों के उत्थान के लिए प्रयास करने की उस जिम्मेदारी से, जिसके लिए संविधान के नीति निर्देशक सिद्धांतों के तहत राज्य वचनबद्ध है. फिर उस आरक्षण के साथ इसे जोड़ देना चूक नहीं साजिश है. इसके साथ एक और नुक्ता जुड़ता है, क्या सच में जातिगत विभेदन और उससे पैदा होने वाली गैरबराबरी खत्म हो गयी है और अब समस्या जाति नहीं आरक्षण है?

अब जरा अपने देश के निजी क्षेत्र पर नजर डालें, जहां अभी हाल में ही यूनिवर्सिटी ऑफ नॉर्थ ब्रिटिश कोलंबिया के डी अजित व अन्यों के अध्ययन में चौंकाने वाले आंकड़े मिले हैं. भारत की शीर्ष 1000 निजी कंपनियों के निदेशक बोर्ड में सवर्ण 93 प्रतिशत, ओबीसी 3.8 प्रतिशत और दलित 3.5 प्रतिशत हैं! इससे ज्यादा और कुछ कहने की शायद जरूरत नहीं होनी चाहिए. यही तर्क भी है आरक्षण के कम-से-कम तब तक जारी रखने का, जब तक कि भारतीय समाज बहुलवादी न हो जाये. आखिर किसी भी समाज के उत्थान की कोशिशों के लिए उसके अंदर एक खास वर्ग का होना जरूरी है.

आप चाहे उसे मध्यवर्ग कहें, या वामपंथ की भाषा में हरावल, जब तक रोज दिहाड़ी करके खाने की चिंता से मुक्त ऐसा वर्ग अस्मिताओं के अंदर पैदा नहीं होगा, उनके मुक्त होने की संभावना बहुत कम होगी. आरक्षण ने तमाम उत्पीड़ित अस्मिताओं के अंदर ऐसा ही वर्ग खड़ा करने में सफलता पायी है. आरक्षण लागू रखने के पीछे सबसे मजबूत तर्क बस यही है. और यह भी कि एक ऐसा वर्ग खड़ा हो जाने के बाद सामाजिक शक्ति-संबंधों में आने वाले बदलावों से जाति को बड़ा धक्का लगेगा और तब शायद आरक्षण की जरूरत ही न रह जाये.

Saturday, July 14, 2012

स्वयंसेवी संस्थान "मुक्तिदूत " की स्थापना

बिहारीगंज प्रखंड अंतर्गत गमैल पंचायत में "मुक्तिदूत " नामक  स्वयंसेवी संस्थान  की  स्थापना की गई ! व्यापक उद्देश्य लिए राष्ट्रीय  स्तर के इस गैर सरकारी संगठन का सञ्चालन पंचायत के स्थानीय युवकों के द्वारा किया जा रहा है !


यह संगठन समाज सेवा  से प्रेरित हो  कर कई प्रकार के उद्देश्य अपने आप में समाहित किये हुए हैं ! संस्था द्वारा समाज के दलित  ,शोषित , पिछड़े , असहाय तथा आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के विकास हेतु कई प्रकार के कार्यक्रमों का सञ्चालन , बालश्रमिक ,महिला श्रमिक आदि का उत्थान ,पर्यावरण संरक्षण हेतु जन जागरूकता ,लोगों के बीच  स्वरोजगार अपनाने हेतु कुटीर एवं  लघु उद्द्योगों की स्थापना के लिए सुझाव एवं सहायता , समाज में व्याप्त निरक्षरता एवं बेरोजगारी उन्मूलन हेतु शिक्षण एवं प्रशिक्षण की व्यवस्था करना आदि कार्य को शामिल किया गया है ,जो इसके समाज सेवा की महत्वाकांक्षा को दर्शाते हैं !

इस संगठन में अध्यक्ष पद पर  श्री संजय झा (गमैल ), सचिव पद पर  श्री अमित कुमार मिश्र (गमैल ) जबकि कोषाध्यक्ष के पद पर श्रीमती अलका झा ने कार्यभार ग्रहण किया है ! सदस्यों में कंचन मिश्र , अनीता देवी , सुनील श्रीवास्तव एवं कई सदस्य शामिल हैं  !

आशा की जाती है कि "मुक्तिदूत " नामक इस संगठन के द्वारा बिहारीगंज के साथ -साथ ,आस-पास के क्षेत्र के लोगों को भी इस संस्था का लाभ  मिलेगा ! 

Wednesday, July 11, 2012

रोजगार के नए अवसर

राज्य के भूमि सुधर विभाग द्वारा अमिन , मुह्रीर  ,लिपिक , कम्प्यूटर ओपेरटर , अनुसेवक आदि पदों के ली संविदा पर नियुक्ति का विज्ञापन दिया गया है !
अधिक जानकारी के लिए इस लिंक को क्लिक करें !
http://lrc.bih.nic.in/docs/adv_10072012162.pdf

Tuesday, July 10, 2012

अरमानों को कुचलता सावन


 रिमझिम फुहारों की वो  झड़ी जब अपनी मनमोहक अदाओं से धरती के सूखे अधरों  पर अमृत वर्षा की श्रीन्खला अपने चरम पर पहुँचा  कर मेरे मनोभावों को भिगोएगी तब शायद मैं एक- आध कविताएँ अपनी रचना कोष में शामिल कर पाऊँ !




यही सोच कर  मेरी आँखे बार-बार आकाश की ओर निहारती हैं ! सजते हुए घटाओं  को देख मैं आनंदित होकर अपने कलम और डायरी को ढूँढने लग जाता हूँ ! पर जाने क्या हुआ इन बादलों को जो बार -बार सज- संवर कर आते तो हैं  ,किन्तु  विरह - वेदना में तड़पती हुई अपनी प्रियतमा 'धरती' को यूँ ही छोड़ किसी धोखेबाज प्रेमी की तरह छल कर वापस लौट जाते हैं ! और इसी के साथ-साथ मेरी भी मनोकामनाएँ  अधूरी रह जाती है !

फिर निराश हो कर समाचार -पत्र और   टी. वी. चैनलों में प्रसारित होने वाले मौसम समाचारों की और ध्यान जाता है !-- " अगले २४ घंटे में पूरे प्रदेश में झमाझम बारिश की संभावना है ! " ऐसी ख़बरों को देख एक बार फिर से मेरा ह्रिदय  उत्साहित होने लगता है ! हालाँकि कई क्षेत्रों में बारिश होती भी है किन्तु बिहारीगंज की धरती  मिलन की आस लिए अपने नसीब पर आंसू ही बहाती है ! फिर, इस सावन में मेरी कामनाओं पर निराशाओं के बदल छाने लगते हैं ! मन में एक अजीब सी बैचेनी होने लगती है कि कहीं मेरी लेखनी अधूरी ही न रह जाये !

लेखनी तो एक रुचि है जो इस सावन न भी हो तो इसका  अगले सावन तक इन्त्जार  किया जा सकता है , किन्तु हमारी अर्थव्यवस्था का मूल आधार 'भारतीय कृषि' का क्या होगा जो पूरी तरह मानसून पर ही निर्भर करती है ? अच्छी बारिश हुई तो फसल पैदावार अच्छी नहीं सूखे कि मार !

बेचारे मन को  लेखनी कार्य से महरूम रहने पर किसी तरह से समझाया था , पर अब यह फिर से बेचैन होने लगा ! बिहार जैसा प्रदेश जहाँ  सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान ३०% से अधिक है इसका क्या होगा ? सबसे अधिक जनसँख्या घनत्व  तथा तीसरे  सबसे अधिक जनसँख्या वाला यह राज्य जो विकास की सीढियों  पर चलना शुरू ही  किया  , क्या इसके पैर फिर से लड़खड़ा जायेंगे ?  पहले से ही महंगाई कि मार  झेल रही जनता के लिए मानसून का दगा देना दोहरी मार साबित नहीं होगी ? बारिश की कमी   से पैदावार कम होंगें,  फिर यह महंगाई डायन सबको  डसना शुरूकर देगी ! बिहार का विकास दर घटेगा साथ में देश का भी  ! यह भी हमारे लिए दोहरी प्रतिकूल परिस्थिति ही होगी ! भारत का विकास दर जो ८.५% से गिर कर  इस वित्तीय वर्ष कि पहली तिमाही में ५.५% पर आ गया है !फलतः विदेशी निवेश कि दर भी घट रही है , महंगाई का आलम जगजाहिर है और ऊपर से मौसम कि ये बेरूखी देश के विकाश दर को निश्चय ही रसातल कि और ले जायेगी  !

मन के ये भाव कहाँ सावन में चला था अपनी लेखनी कार्य को बढ़ाने पर ये एक नै चिंता में डूब गया ! क्या है मानसून ? आखिर क्यूँ ये अपने सही वक्त पर नहीं आया ? क्यूँ ये बदल सज - संवर कर आते तो हैं किन्तु बिन बरसे ही मेरे साथ -साथ लाखों के अरमानों को कुचल कर चले जाते हैं !

जहाँ तक मानसूनी हवाओं का प्रश्न है , सबसे पहले भूगोल्शाश्त्री अलमसूदी ने इसके बारे में बताया !भारतीय उप-महाद्वीप में मौसम परिवर्तन हवाओं कि दिशाओं पर निर्भर करता है ! मानसून की  उत्पत्ति के सम्बन्ध में कई सिद्धांत प्रचलित हैं -
तापीय प्रभाव सिद्धांत के अनुसार ग्रीष्म मौसम में सूर्य के उत्तरायण होने के बाद अत्यधिक गर्मी के कारण भारतीय उप-महाद्वीप के पशिमोत्तर भाग में अति निम्न दाब का क्षेत्र बन जाता है जबकि हिंद महासागर में उच्च दाब का ! समुद्री उच्च वायुदाब से हवाएं जलवाष्प  लाकर  निम्न दाब की  और आती हैं जिसकी वजह से भारतीय उप-महाद्वीप के ऊपर जमकर वर्षा होती है !
वहीँ एलनीनो सिद्धांत के अनुसार दक्षिण अमेरिका के पेरू तट  पर चलने वाली गर्म जलधारा (एलनीनो ) का प्रभाव भारतीय मानसून पर पड़ता है !इस गर्म जलधारा की  वजह से हिंद महासागर में बनने वाला उच्च वायुदाब  कमजोर हो जाता है ! जिस कारण मानसून का प्रभाव कम हो जाता है !

मेरा मन फिर से एक बार बेचैन होने लगा क्या मेरी कविता पूरी न हो पाने का कारण ये कमबख्त एलनीनो है ?

Friday, July 6, 2012

वेतन पाने के लिए धरना - प्रदर्शन


बिहार सरकार  द्वारा संविदा पर बहाल शिक्षा कर्मियों को   वेतन भुगतान एवं वेतन  बढ़ोतरी का  लाभ  नही  मिलने के कारण  बिहारीगंज  में नियोजित  शिक्षकों द्वारा प्रखंड  संसाधन केंद्र में ताला जड़ कर विरोध किया गया !



 विदित हो कि इन शिक्षकों को बिहार सरकार द्वारा अकुशल मजदूरों के लिए तय की गई न्यूनतम मजदूरी 119 रुपिये प्रतिदिन से थोड़ा सा अधिक 200 रुपिये प्रतिदिन के हिसाब से मजदूरी दी जा रही है ! इतनी कम मजदूरी  के  बाद भी इन्हें अपना वेतन समय पर नहीं मिल पाता है जिस कारण इनके परिवार की माली हालत काफी बदतर हो रही है !इन  शिक्षकों से अधिक किस्मत वाले मनरेगा मजदूर हैं जिन्हें कम करने के 15 दिन  बाद मजदूरी गारंटी स्वरूप मिल जाती है , जबकि ये शिक्षक वेतन हेतू बी आर सी कार्यालय के चक्कर लगाते लगाते  थक जाते हैं !


समस्या सिर्फ बिहारीगंज की ही नहीं है , बल्कि बिहार के सभी प्रखंडों की कमोबेश यही स्थिति है ! एक तरफ हमारी सरकार शिक्षा को  बेहतर बनाने की  दिशा में नित नए नए प्रयोग  कर रही है  , जबकि शिक्षण व्यवस्था के मूल घटक (शिक्षक ) को सम्मानजनक वेतन एवं मूलभूत सुविधाएँ मुहैया कराने से भी परहेज कर रही है !


 आये दिन  हमें यह सुनने को मिलता है की अमुक  स्कूल में शिक्षक अनुपस्थित पाए गए !  यह कहना गलत नहीं होगा कि वर्तमान युग  अर्थयुग है !आर्थिक सुरक्षा का प्रश्न इस समय हर किसी के भविष्य के लिए  सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है ! महत्वपूर्ण विचारनीय प्रश्न यह है कि  इस मंहगाई के दौर में  6000 रुपिये से कैसे कोई एक परिवार के लिए महीने भर का बजट बनाये जिसमे भोजन , वस्त्र , आवास , स्वस्थ्य , शिक्षा ,के खर्च को शामिल किया जा सके !


स्वाभाविक है कि  इन परिस्थितियों में शिक्षकों का विद्द्यालय के प्रति आध्यात्मिक एवं मानसिक लगाव नहीं बन पायेगा  , और ऐसी परिस्थिति में सरकार  द्वारा शिक्षा के  क्षेत्र में किये जा रहे सारे प्रयोग ( शिक्षक डायरी , सतत एवं व्यापक मूल्यांकन ) असफल ही साबित होंगे !

Tuesday, June 12, 2012

मत छीनो मुझसे मेरा बचपन ...!

खुशियों के बसेरे में, मैं भी जीना चाहता हूं,

महसूस करना चाहता हूं बचपन की मौज-मस्ती,

तारों की टिमटिमाहट मैं भी देखना चाहता हूं,

आखिर मैं भी पढ़ना चाहता हूं,

आखिर मैं भी पढ़ना चाहता हूं…………..



World Day Against Child Labour

बचपन जिंदगी का सबसे सुहाना और यागदार सफर होता है. बचपन की मौज-मस्ती को इंसान मरते दम तक याद रखता है. मां की ममता, पिता का स्नेह, दोस्तों का साथ, स्कूल की मौज शायद इन्हीं यादों में बचपन कब बीत जाता है कोई जान ही नहीं पाता. लेकिन बचपन की यादें हर किसी के लिए सुहानी नहीं होतीं. कई लोगों के लिए बचपन एक अभिशाप होता है. जिस बचपन को लोग वरदान मानते हैं वह अभिशाप कैसे हो सकता है? अगर यह जानना है तो उस बच्चे की मार्मिक कहानी पर एक नजर अवश्य डालिए जो आपके घर के बाहर के ढाबे या चाय वाले के यहां बर्तन धोता है, कड़वी बचपन की यादों का स्वाद उस बच्चे को ही पता होता है जो रेलवे स्टेशनों पर पड़ी प्लास्टिक की बोतलों को इकठ्ठा करता है.

Chil LabourWorld Day Against Child Labour

आज बाल श्रम निरोध दिवस है. साल के कई सौ दिनों में से एक जिसे समाज के बुद्धिजीवियों ने उन बच्चों के नाम किया है जो बचपन की मौज मनाने की बजाय श्रम करते हैं. हम लोग जब भी किसी मीटिंग या सामाजिक स्थल पर बैठे होते हैं तो समाज के बारे में बड़ी-बड़ी बाते करने से पीछे नहीं हटते. बाल श्रम भी एक ऐसा ही टॉपिक है जिस पर लोग अक्सर किसी चाय वाले के पास बैठकर लंबा भाषण देते हैं और फिर आवाज लगाते हैं “ओए छोटू ग्लास ले जा.”

World Day Against Child Labour

बड़ी-बड़ी बातें, बड़े-बड़े नारे लगाने के बाद भी बाल श्रमिकों की हालत आज भी वैसी ही है जैसे पहले थी. भारत समेत लगभग सभी विकासशील देश और यहां तक की विकसित देशों में भी आपको बाल श्रम देखने को मिलेगा. चाय वाले की दुकान हो या कोई होटल और तो और भारत में तो बाल श्रमिकों का एक बड़ा हिस्सा चूड़ी बनाने, पटाखा बनाने और अन्य खतरनाक कामों में भी लिप्त है. इन बच्चों को चंद पैसा देकर इनके मालिक इनसे जरूरत से ज्यादा काम कराते हैं. कम पैसे में यह बच्चे अच्छी मजदूरी देते हैं और ज्यादा आवाज भी नहीं उठाते, यही वजह है कि ऐसे कारखानों के मालिक बच्चों को शोषित करने का कोई भी मौका नहीं गंवाते.

World Day Against Child Labour

सैकड़ों बचपन असमय ही हाथों में कलम के बदले पेट की आग बुझाने के लिए किसी होटल में जूठन धोने, ईट भट्ठा में ईट ढोने, खेतों में मिट्टी काटने, साइकिल दुकानों अथवा मोटर गैराजों में मजदूरी करने में बीत रहा है. बाल श्रम अधिनियम बनने के बाद भी बाल श्रमिकों पर अंकुश नहीं लग पा रहा है. होटल, ढाबों, उद्योगों और कारखानों में बाल श्रमिकों को काम करते देखा जा सकता है. जबकि श्रम विभाग इस ओर मूकदर्शक बना है.


Government report on child
योजना आयोग (भारत सरकार ) के  अनुसार वर्तमान समय में लगभग 49 लाख बाल श्रमिक भारत में कार्यरत हैं , जबकि सरकार के पास उपलब्ध गैर सरकारी संगठनो द्वारा दिए गए आंकड़ो के अनुसार यह संख्या 24 करोड़ से ऊपर बताई जा रही है !
 

बाल श्रम (प्रतिबंध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986

बाल श्रम (उन्‍मूलन और विनियमन) अधिनियम, 1986 चौदह वर्ष से कम उम्र के बच्‍चों को 18 प्रकार के कारखानों तथा 65 प्रक्रियाओं में नियोजन पर प्रतिबंध लगाया गया  है ,और कुछ अन्‍य रोज़गारों में उनके काम की स्थितियों को विनियमित करने के लिए अधिनियमित किया गया था.


बाल श्रम प्रतिबंधित एवं विनिमय अधिनियम की धारा तीन के अतिरिक्त प्रावधानों पर एक माह की सजा और एक हजार का जुर्माने का प्रावधान है. लेकिन इसके बाद भी बाल श्रम रुकने का नाम नहीं ले रहा है. सरकार ने कानून से विरक्त हुए बच्चों के लिए बाल श्रमिक स्कूल भी खोले हैं लेकिन वह भी निरर्थक ही साबित हो रहे हैं.


श्रम विभाग अगर कड़ाई से कानून का पालन कराए और श्रम कराने वाले अभिभावकों व काम लेने वाले मालिकों को समझाने का अभियान छेड़ दे तो कुछ बात बन सकती है. लेकिन समाज के इस वर्ग की किसी को खास परवाह नहीं है. सरकार के पास देखने के लिए और भी कई मुद्दे हैं और श्रम विभाग को बाल श्रमिकों से पैसे तो मिलते नहीं जो उनकी मदद करे. आज बाल श्रमिक निषेध दिवस पर उम्मीद है सरकार और जनता का ध्यान इस ओर जरूर जाएगा.
विलखता बचपन
छोटे से बचपन पर दण्डों की भरमार
होता था नित्य बचपन पर प्रहार !
न कोई कापी न कोई रेट
छोटा सीना लम्बा सा पेट !
बेचारा 'सुरना' भूख की तंगियों से
आ पड़ा था अपने गाँव की गलियों से!
कभी बर्तन को घिसना कभी चौका लगाना
थक पड़े अगर तो वही दंड पुराना !
बदन में घमौरी आँखों में पानी
ये कैसी विडंबना है ये कैसी है कहानी ...?







Monday, June 4, 2012

मेरे बच्चे अभी बहुत छोटे हैं लेकिन उनके साथ बिताए हर पल मेरी आंखों के सामने आ गए. तीन महीने पहले बुखार से तप रहे तीन साल के बेटे की दवाई लाने के लिए रात के एक बजे अपने घर से पंद्रह किलोमीटर दूर जाना, अंजानी सडकों में कैमिस्टों की खुली दुकानें टटोलते खाली हाथ वापस आना और रातभर गीली पट्टी करते हुए सुबह डॉक्टर के क्लीनिक खुलने का इंतज़ार करना......
ऐसे में मुझे बरबस मेरे पिता याद आते रहे… और मम्मी का मुझे अक्सर यह बतलाना कि कैसे बचपन में मेरी सलामती के लिए दोनों रात-रात भर जागते रहे
थे......

और फिर मुझे बार-बार यह भी याद आता रहा कि न जाने कितने ही मौकों पर मैंने जानते हुए उनका दिल दुखाया… अनजाने की तो कोई गिनती भी न होगी.

आप शायद समझ रहे होंगे मेरे भीतर क्या चल रहा है. एक दिन मैं भी बूढ़ा हो जाऊंगा और उस समय के लिए मैं अपने बच्चों से आज यही कहना चाहूंगा :-

“मेरे प्यारे बच्चों,

जिस दिन तुम्हें यह लगे कि मैं बूढ़ा हो गया हूं, तुम खुद में थोड़ा धीरज लाना और मुझे समझने की कोशिश करना…

जब खाना खाते समय मुझसे कुछ गिर जाए… जब मुझसे कपड़े सहेजते न बनें… तो थोड़ा सब्र करना, मेरे बच्चों…और उन दिनों को याद करना जब मैंने तुम्हें
यह सब सिखाने में न जाने कितना समय लगाया था.

मैं कभी एक ही बात को कई बार दोहराने लगूं तो मुझे टोकना मत. मेरी बातें सुनना. जब तुम बहुत छोटे थे तब  हर रात मुझे एक ही कहानी बार-बार सुनाने
के लिए कहते थे, और मैं ऐसा ही करता था जब तक तुम्हें नींद नहीं आ जाती थी.

अगर मैं कभी अपने को ठीक से साफ न कर पाऊं तो मुझे डांटना नहीं… यह न कहना कि यह कितने शर्म की बात है…तुम्हें याद है जब तुम छोटे थे तब तुम्हें अच्छे से नहलाने के लिए मुझे नित नए जतन करने पड़ते थे?

हर पल कितना कुछ बदलता जा रहा है. यदि मैं नया रिमोट, मोबाइल, या कम्प्यूटर चलाना न सीख पाऊं तो मुझपर हंसना मत… थोड़ा वक़्त दे देना… शायद मुझे यह सब चलाना आ जाए.

मैं तुम्हें ज़िंदगी भर कितना कुछ सिखाता रहा…अच्छे से खाओ, ठीक से कपड़े पहनो, बेहतर इंसान बनो, हर मुश्किल का डटकर सामना करो… याद है न?

बढ़ती उम्र के कारण यदि मेरी याददाश्त कमज़ोर हो जाए… या फिर बातचीत के दौरान मेरा ध्यान भटक जाए तो मुझे उस बात को याद करने को मौका ज़रूर देना. मैं कभी कुछ भूल बैठूं तो झुंझलाना नहीं… गुस्सा मत होना… क्योंकि उस समय तुम्हें अपने पास पाना और तुमसे बातें कर सकना मेरी सबसे बड़ी खुशी होगी… सबसे बड़ी पूंजी होगी.

अगर मैं कभी खाना खाने से इंकार कर दूं तो मुझे जबरन मत खिलाना. बुढ़ापे में सबका हिसाब-खिताब बिगड़ जाता है. मुझे जब भूख लगेगी तो मैं खुद ही खा
लूंगा.

एक दिन ऐसा आएगा जब मैं चार कदम चलने से भी लाचार हो जाऊंगा…उस दिन तुम मुझे मजबूती से थामके वैसे ही सहारा दोगे न जैसे मैं तुम्हें चलना सिखाता
था?

फिर एक दिन ऐसा भी आएगा जब मैं तुमसे कहूंगा – “मैं अब और जीना नहीं चाहता… मेरा अंत निकट है”. यह सुनकर तुम नाराज़ न होना… क्योंकि एक दिन
तुम भी यह जान जाओगे वृद्धजन ऐसा क्यों कहते हैं.

यह समझने की कोशिश करना कि एक उम्र बीत जाने के बाद लोग जीते नहीं हैं बल्कि अपना समय काटते हैं. 

एक दिन तुम यह जान जाओगे कि अपनी तमाम नाकामियों और गलतियों के बाद भी मैंने हमेशा तुम्हारा भले के लिए ही ईश्वर से प्रार्थना की.

अपने प्रेम और धीरज का सहारा देकर मुझे ज़िंदगी के आखरी पड़ाव तक थामे रखना. तुम्हारी प्रेमपूर्ण मुस्कान ही मेरा संबल होगी.

कभी न भूलना मेरे प्यारे बच्चों… कि मैंने तुमसे ही सबसे ज्यादा प्रेम किया.