Monday, June 24, 2013

कर्पूरी जी का अज्ञातवास

सन् 1975 के जून में इस देश में जब आपातकाल लागू हुआ, तब संयोग से कर्पूरी ठाकुर नेपाल के राजबिराज में ही थे. आपातकाल की गंभीरता को समझते हुए उन्होंने नेपाल में ही रह कर भारत में जारी आपातकाल विरोधी भूमिगत आंदोलन के कार्यकर्ताओं के संपर्क में रहने का फैसला किया. भारत सरकार को इस बात की सूचना मिल गयी. नेपाल पुलिस और वहां की खुफिया एजेंसी भी कर्पूरी जी पर निगरानी रख रही थी. नेपाल सरकार ने उनसे कहा कि वे एक जगह से दूसरी जगह जाने से पहले नेपाली अधिकारियों से अनुमति ले लें. कपरूरी ठाकुर की नेपाल में उपस्थिति को लेकर भारत सरकार चिंतित थी.


भारत सरकार ने नेपाल सरकार से कहा कि वह कर्पूरी ठाकुर को उसके हवाले कर दे. नेपाल ने साफ इनकार कर दिया और कहा कि जिस तरह नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री बीपी कोइराला भारत में रह रहे हैं, उसी तरह कर्पूरी ठाकुर भी नेपाल में हैं. नेपाल के इस रुख से कर्पूरी जी को तात्कालिक राहत मिल गयी. वे चाहते थे कि नेपाल में ही भूमिगत रह कर भारत में जारी इंदिरा सरकार विरोधी गतिविधियों पर नजर रखें और जरूरत पड़े तो उन्हें संचालित भी करें. देश में दमन जारी था. जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, चरण सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी और चंद्रशेखर सहित सभी बड़े नेता गिरफ्तार हो चुके थे. प्रतिपक्षी राजनीतिक गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध था. मीडिया पर भी कठोर सेंसरशिप लग गया था. भारत आने का मतलब था, जेल में बंद हो जाना. ऐसे में नेपाल पर भारत का भारी दबाव पड़ा. नेपाल भी भारत से संबंध खराब नहीं करना चाहता था. इसलिए उसने कर्पूरी ठाकुर पर भी पांच सूत्री प्रतिबंध लगा दिया. मीडिया के प्रतिनिधियों से मिलने पर पाबंदी लगा दी गयी.
कर्पूरी जी पर यह भी प्रतिबंध लगा कि वे न तो समाचार पत्रों या पत्रिकाओं के लिए कोई लेख लिखेंगे और न ही कोई बयान जारी करेंगे.
यह पाबंदी भी कि नेपाल से बाहर वे किसी प्रकार का पत्र व्यवहार नहीं करेंगे. विदेशी दूतावासों के काठमांडू स्थित कर्मचारियों से किसी प्रकार का संबंध नहीं रखना होगा. यहां तक कि नेपाल के राजनीतिक नेताओं और कार्यकर्ताओं से भी संबंध रखने पर प्रतिबंध लगा दिया गया. नेपाल यह भी नहीं चाहता था कि ठाकुर तराई में रहें, क्योंकि वहां से भारत में गतिविधियां चलाना आसान था. जुलाई के दूसरे सप्ताह में नेपाल सरकार उन्हें विमान से काठमांडू ले गयी. वहां उन्हें नजरबंद कर दिया गया. नेपाल की सीआइडी के अलावा भारतीय दूतावास की खुफिया पुलिस भी कर्पूरी जी पर निगरानी रखने लगी. वे जहां जाते थे, सब पीछे लग जाते थे. सोने की जगह में भी पासवाले कमरे में खुफिया पुलिस सोती थी. इतना ही नहीं, कर्पूरी ठाकुर ने 1977 में एक पत्रिका से भेंटवार्ता में बताया था कि अपने नेपाल के अज्ञातवास के दौरान मैं जिन लोगों से संपर्क में आया, उन पर नेपाल सरकार ने जुल्म भी ढाये. याद रहे कि आपातकाल के बाद कर्पूरी ठाकुर बिहार के मुख्यमंत्री बने.

कर्पूरी जी ने बताया था कि काठमांडू के मेरे मित्र प्रो एसएन वर्मा की प्रोफेसरी नेपाल ने छुड़ा दी. वर्मा का यही कसूर था कि उन्होंने मुङो काठमांडू स्थित अपने आवास में शरण दी थी. जब मैं नेपाल से भाग निकला तो वर्मा को दस महीने तक जेल में रखा गया. कपरूरी जी के चुनाव क्षेत्र का एक व्यक्ति काठमांडू में रह कर छोटा मोटा काम करता था. पुलिस ने उसे इतना तंग किया कि उसने नेपाल छोड़ दिया. छपरा के एक व्यक्ति का काठमांडू में एक सैलून था, जहां कर्पूरी जी दाढ़ी बनवाते थे, उसे पुलिस ने इतना पीटा कि वह अधमरा हो गया. कर्पूरी जी के अनुसार नेपाल पुलिस इन लोगों पर इसलिए नाराज थी कि कैसे मैं नेपाल से निकल भागा और इन लोगों ने पुलिस को क्यों इसकी पूर्व सूचना नहीं दी.

याद रहे कि नेपाल की खुफिया पुलिस को चकमा देकर 6 सितंबर, 1975 को लिवास और अपना नाम बदल कर कर्पूरी ठाकुर थाई एयरवेज के जहाज से काठमांडू से कलकत्ता पहुंच गये. वहां बिहार के चर्चित कांग्रेसी नेता राजो सिंह और रघुनाथ झा मिले. उन्होंने कर्पूरी जी को पहचान लिया. राजो सिंह ने कागज के बहाने कर्पूरी जी की जेब में कुछ रुपये भी रख दिये. कांग्रेसी होते हुए भी इन लोगों ने कर्पूरी जी के बारे में पुलिस को सूचना नहीं दी, जबकि पुलिस उन्हें बेचैनी से तलाश रही थी. संभवत: ऐसा कर्पूरी जी के शालीन स्वभाव और ईमानदार छवि के कारण हुआ

Wednesday, June 19, 2013

प्रेरणास्रोत हैं बीएन मंडल




आजादी की लड़ाई में वे कई बार जेल गये और यातनाएं झोली. जमींदार परिवार से आने पर भी वे हमेशा गरीबों और शोषितों के बीच रह कर उन्हीं के हिमायती बने रहे. वे जीप और कार की सवारी छोड़ गांवों में बैलगाड़ी की सवारी करते थे. ऐसे वक्त में, जब पद और सत्ता पाने के लिए तमाम तरह के जोड़तोड़ की खबरें आ रही हों, यह जानना दिलचस्प होगा कि उन्होंने बिहार की पहली गैर-कांग्रेसी सरकार में अहम पद लेने से इनकार कर दिया था. हम बात कर रहे हैं आजादी की लड़ाई के साथ-साथ देश में समाजवाद की स्थापना में अहम योगदान देनेवाले प्रखर नेता भूपेंद्र नारायण मंडल की, 

बीएन मंडल का जन्म मधेपुरा जिले के रानीपट्टी गांव में संपन्न जमींदार परिवार में 1 फरवरी, 1904 को हुआ. उन्होंने भागलपुर से स्नातक व पटना विवि से कानून की डिग्री प्राप्त ली. विद्यार्थी जीवन में ही वे गांधीजी के असहयोग आंदोलन से जुड़ गये थे. वकालत पेशे में आने पर 1942 में हजारों लोगों के साथ मधेपुरा कचहरी पर यूनियन जैक उतार कर हिंदुस्तान का झंडा फहरा दिया. उन्होंने उसी दिन वकालत छोड़ दी.

1937 में कई प्रांतों में आंतरिक सरकार की स्थापना हुई. कांग्रेस प्रगतिशील गुट के बड़े नेताओं ने सोशलिस्ट ग्रुप की स्थापना की, जिसके नेता जयप्रकाश नारायण, अच्युत पटवर्धन, आचार्य नरेंद्रदेव, डॉ लोहिया आदि थे. भूपेंद्र बाबू इन्हीं नेताओं के साथ सोशलिस्ट पार्टी में शामिल हो समाजवादी सिद्धांतों के लिए संघर्षरत रहे. 1948 में सोशलिस्ट पार्टी कांग्रेस से अलग हो गयी. 1952 में उसने आम चुनाव लड़ा. कांग्रेस सत्ता में आ गयी. जेपी 1954 में राजनीति से संन्यास लेकर भूदान आंदोलन में चले गये और आगे चल कर सोशलिस्ट पार्टी भी दो भागों, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी और सोशलिस्ट पार्टी, में बंट गयी. प्रजा सोशलिस्ट पार्टी को चुनाव चिह्न् झोपड़ी मिला और सोशलिस्ट पार्टी को बरगद का पेड़, जो सोशलिस्टों का 1952 में भी चुनाव चिह्न् था. समाजवादियों के एक ग्रुप यानी सोशलिस्ट पार्टी का नेतृत्व डॉ लोहिया कर रहे थे, जिसमें मधु लिमये, मामा बालेश्वर दयाल, बद्रीविशाल पित्ती, पीवी राजू, जार्ज फर्नाडीस, इंदुमति केलकर, राजनारायण, रामसेवक यादव एवं बीएन मंडल सरीखे नेता थे.

बीएन मंडल बिहार सोशलिस्ट पार्टी के आधार स्तंभ बने. इस पार्टी के नेताओं में अक्षयवट राय, सीताराम सिंह, बाबूलाल शास्त्री, तुलसी दास मेहता, पूरनचंद, उपेन्द्र नारायण वर्मा, भोला सिंह, श्रीकृष्ण सिंह, अवधेश मिश्र, जगदेव प्रसाद, रामइकबाल वरसी, सच्चिदानंद सिंह, जितेन्द्र यादव आदि थे. 1957 के चुनाव में सोशलिस्ट पार्टी (पेड़ छाप) से बीएन मंडल एकमात्र विधायक चुने गये थे. पर, डॉ लोहिया की नीति, सिद्धांत सिद्धांत, स्पष्टवादिता और खुले एजेंडे को जनता ने खूब पसंद किया. बीएन मंडल ने अपनी प्रतिभा एवं सिद्धांतों के बल पर बिहार विधानसभा में अकेले रह कर भी समाजवादी विचारों को प्रचारित-प्रसारित करते हुए भाषण और विरोध के बल पर गरीबों और शोषितों के सवाल को बड़े पैमाने पर उठाया. 1962 में सोशलिस्ट पार्टी के सात विधायक चुने गये और 1967 में पेड़ छाप वाली संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (संसोपा) के 70 विधायक चुने गये. संसोपा बिहार में पहली गैर कांग्रेसी सरकार के प्रमुख घटक दल के रूप में उभरी. बीएन मंडल को बिहार की पहली गैर कांग्रेसी सरकार में प्रमुख पद दिया जा रहा था, लेकिन उन्होंने उस पद को लेने से इनकार कर दिया. उनकी राय थी कि जो व्यक्ति संसद सदस्य हो, विधानसभा सदस्य नहीं हो, उसे नैतिकता व सिद्धांत के आधार पर विधानसभा का कोई पद धारण नहीं करना चाहिए. डॉ लोहिया भी प्रारंभ से ही विधायिका के एक पद को छोड़ कर लालच या लोभ में दूसरे बड़े पद पर जाने को बेईमानी समझते थे. लोहिया जी के विचारों से बीएन मंडल सहमत थे. इसलिए संसद सदस्य होने के कारण वे मुख्यमंत्री या मंत्री पद लेने को तैयार नहीं हुए. उसी सरकार में महामाया बाबू मुख्यमंत्री और संसोपा की ओर से कपरूरी ठाकुर उप मुख्यमंत्री बने थे.
सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के रूप में भूपेन्द्र बाबू ने 1962 में कांग्रेस नेता ललित नारायण मिश्र को लोकसभा चुनाव में हराया था. वे 1966 और 1972 में राज्यसभा के लिए चुने गये. अपने संसदीय जीवन में उन्होंने राज्य और राष्ट्रहित में हमेशा गंभीरतापूर्वक अपनी राय दी. विदेशनीति और अंतरराष्ट्रीय घटनाओं पर भी उनकी पैनी दृष्टि रहती थी.

Sunday, June 9, 2013

सरकारी शिक्षा से बेरुखी

सरकारी शिक्षा से बेरुखी


अगर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की एक महत्वपूर्ण कड़ी शिक्षक है, तो अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा देने के इस युग में सरकार की तरफ से हरचंद ऐसी कोशिश हुई है कि शिक्षक, पढ़ानेवाला कम और न्यूनतम मजदूरी को तरसता मजदूर ज्यादा नजर आये. वह कहीं ‘शिक्षा-मित्र’ (बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश) कहलाता है, तो कहीं ‘पारा शिक्षक’ (झारखंड), तो कहीं ‘विद्या-वालंटियर’ (आंध्रप्रदेश)   या विद्द्या सहायक ( गुजरात में ) . अगर उसे कुछ नहीं कहा जाता तो शिक्षक.
ऐसे उदाहरण बहुत कम देखने को मिलते हैं, जब किसी ने सत्ता के शीर्ष पद पर पहुंचने के बावजूद अपनी स्वाभाविक साधुता बरकरार रखी हो. गरीबी में पले, सरकारी स्कूलों में पढ़े, बच्चों के बीच बेहद लोकिप्रय और उनके भीतर भविष्य का भारत देखनेवाले पूर्व राष्ट्रपति डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम ऐसे ही शख्सीयतों में शुमार किये जाते हैं. कलाम साहब पद पर रहते हुए सत्ता के गलियारे में इस या उस पार्टी के हित में चाल चलने के लिए नहीं, बल्कि भारत की हित-चिंता करनेवाले व्यक्ति के रूप में जाने गये और रिटायरमेंट के बाद वे एक बार फिर से ‘सादा जीवन, उच्च विचार’ की उसी शैली में दिन बिता रहे हैं, जिसकी उम्मीद आजादी के बाद के दिनों में इस देश के शीर्षस्थ नेताओं ने देश के नागरिकों से की थी.


साधुता हानि-लाभ की चिंता किये बगैर आदमी से सच बुलवा लेती है, बेलाग-लपेट वाला सच. बीते मार्च महीने में कलाम साहब के साथ ऐसा ही वाक्या हुआ. मार्च महीने के दूसरे पखवाड़े की शुरु आत में वे कोलकाता में थे. यहां नेशनल हाइस्कूल की शतवार्षिकी पर आयोजित समारोह में उन्होंने वह बात कही, जो शिक्षा का अधिकार कानून लागू करने के बाद देश का मानव संसाधन विकास मंत्रलय शायद ही कभी कहे या माने. कलाम साहब ने कहा कि शिक्षा कारोबार की वस्तु नहीं है. शिक्षा छात्र, अभिभावक, शिक्षक को एकतार में जोड़नेवाली होनी चाहिए और इसके लिए स्कूल का सिलेबस का अच्छा होना तो जरूरी है ही, उससे भी जरूरी है सिलेबस पढ़ानेवाले का चरित्र से महान होना.


उनके शब्द थे- ‘‘बड़ी इमारत, भरपूर सुविधाओं और बड़े विज्ञापनों से पढ़ाई में गुणवत्ता नहीं आती, पढ़ाई में गुणवत्ता आती है शिक्षक के महान होने से, शिक्षा के भीतर छात्रों के प्रति प्यार के होने से. ’’कलाम साहब कोई नयी बात नहीं कह रहे थे, वह तो सदियों से चली आ रही एक जरूरी मान्यता को फिर से रेखांकित कर रहे थे. एक ऐसी मान्यता जिसे आधिकारिक तौर पर बड़ी तेजी से भुलाया जा रहा है. शिक्षा के मामले में क्या हम बीतते दिनों के साथ यह नहीं मानने लगे हैं कि दुकान ऊंची होगी, तो पकवान भी मीठे होंगे? क्या इसी मान्यता के तहत ऐसे निजी स्कूलों की तादाद नहीं बढ़ी, जो अपने विज्ञापनों में पंचसितारा सुविधाएं देने का वादा करते हैं और निम्न-मध्यम वर्ग का अभिभावक सोचता है कि महंगी फीस चुकाने की बाध्यता के कारण चाहे पेट काटना पड़े, लेकिन बच्चे को ऊंची इमारतों और भरपूर सुविधाओंवाले निजी स्कूल में पढ़ाना जरूरी है?
इसी हफ्ते की खबर है कि सरकार देश में नयी शिक्षा नीति लाना चाहती है और मानव संसाधन विकास मंत्री एमएम पल्लम राजू इस दिशा में पूर्व मंत्री कपिल सिब्बल के नक्शे-कदम पर चलते हुए एक नया शिक्षा आयोग बनाना चाहते हैं. आयोग की रूपरेखा तय करने के लिए बैठकें हो रही हैं, तो उम्मीद की जानी चाहिए कि उसका गठन भी होगा, सिफारिशें आयेंगी और शायद देश में एक और नयी शिक्षा नीति लागू हो जाये. शिक्षा आयोग इस देश में पहले भी बने हैं, उनकी सिफारिशों पर देश के लिए शिक्षा नीतियां पहले भी बनायी गयी हैं, आजादी से पहले और उसके बाद भी. आजादी से पहले इस दिशा में जो प्रयास हुए, उनमें एक प्रयास आजादी के संघर्ष के भरपूर सालों में हुआ था.


सन् 1934 में संयुक्त प्रांत की सरकार ने सप्रू समिति का गठन किया था. चूंकि इस समिति का गठन संयुक्त प्रांत में बढ़ती बेरोजगारी के कारणों का पता लगाने के लिए किया गया था, इसलिए उसकी सिफारिशों के केंद्र में बेरोजगारी का समाधान ही था. उसने सुझाया कि शिक्षा की चालू व्यवस्था तो छात्रों को सिर्फ परीक्षा पास करने और डिग्री हासिल करने के लिए तैयार करती है. समिति का समाधान था कि लोगों को रोजगारपरक शिक्षा दी जानी चाहिए. याद रहे कि भारतीय स्वाधीनता का जो संग्राम उन दिनों सांस्कृतिक मोरचे पर लड़ा जा रहा था, उसका विचार इसके उलट था. ‘शिक्षे! तेरा नाश हो जो नौकरी के हित ही बनी’- तब सांस्कृतिक मोरचे से यह आवाज उठ रही थी.

Tuesday, March 12, 2013

डॉ. अम्बेडकर और महात्मा गांधी



डाक्टर भीमराव अम्बेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को महाराष्ट्र के एक महार परिवार में हुआ था। 1907 में मैट्रिकुलेशन पास करने के बाद बड़ौदा महाराज की आर्थिक सहायता से वे एलिफिन्सटन कॉलेज से 1912 में ग्रेजुएट हुए। कुछ साल बड़ौदा राज्य की सेवा करने के बाद उनको गायकवाड़-स्कालरशिप प्रदान किया गया जिसके सहारे उन्होंने अमेरिका के कोलम्बिया विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में एम.ए. (1915) किया। इसी क्रम में वे प्रसिध्द अमेरिकी अर्थशास्त्री सेलिगमैन के प्रभाव में आए। सेलिगमैन के मार्गदर्शन में उन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय से 1917 में पीएच. डी. की उपाधी प्राप्त कर ली। उनके शोध का विषय था - नेशनल डेवलेपमेंट फॉर इंडिया : ए हिस्टोरिकल एंड एनालिटिकल स्टडी। इसी वर्ष उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स में दाखिला लिया लेकिन साधनाभाव में अपनी शिक्षा पूरी नहीं कर पाए। कुछ दिनों तक वे बड़ौदा राज्य के मिलिटरी सेक्रेटरी थे। फिर वे बड़ौदा से बम्बई आ गए। कुछ दिनों तक वे सिडेनहैम कॉलेज, बम्बई में राजनीतिक अर्थशास्त्र के प्रोफेसर भी रहे। डिप्रेस्ड क्लासेज कांफरेंस से भी जुड़े और सक्रिय राजनीति में भागीदारी शुरू की। कुछ समय बाद उन्होंने लंदन जाकर लंदन स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स से अपनी अधूरी पढ़ाई पूरी की। इस तरह विपरीत परिस्थिति में पैदा होने के बावजूद अपनी लगन और कर्मठता से उन्होंने एम.ए., पी एच. डी., एम. एस. सी., बार-एट-लॉ की डिग्रियां प्राप्त की। इस तरह से वे अपने युग के सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे राजनेता एवं विचारक थे। उनको आधुनिक पश्चिमी  समाजों की संरचना की समाज-विज्ञान, अर्थशास्त्र एवं कानूनी दृष्टि से व्यवस्थित ज्ञान था। वे विदेशों के परिवेश तथा मान्यताओं को पूर्ण रूप से समझते थे, किन्तु उन्होंने अपने कार्यों एवं रचनाओं के द्वारा जिस विचारधारा का प्रचार-प्रसार किया उसकी संरचना में सबसे अधिक भाग भारत की तत्कालीन परिस्थिति में उनके अपने अनुभवों, विवेक एवं दूरदर्शिता की थी। महात्मा गांधी और देंग शियाओ पिंग की तरह डा. अम्बेडकर भी एक रणनीतिक विचारक थे और समय-समय पर आवश्यकता के अनुसार अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अपने विचारों एवं सरोकारों को पिछले अनुभवों के आधार पर संशोधित एवं परिमार्जित भी किया। लेकिन शुरू से अंत तक  उनका लक्ष्य एवं उनके चिंतन की मूल धारा में निरंतरता बनी रही। 1920 के दशक में बंबई में एक बार बोलते हुए उन्होंने साफ-साफ कहा था ''जहाँ मेरे व्यक्तिगत हित और देशहित में टकराव होगा वहाँ मैं देश के हित को प्राथमिकता दूँगा, लेकिन जहाँ दलित जातियों के हित और देश के हित में टकराव होगा, वहाँ मैं दलित जातियों को प्राथमिकता दूँगा।'' वे अंतिम समय तक दलित-वर्ग के मसीहा थे और उन्होंने जीवनपर्यंत अछूतोद्वार के लिए कार्य किया। जब गांधी ने दलितों को अल्पसंख्यकों की तरह पृथक निर्वाचन मंडल देने के ब्रिटिश नीति के खिलाफ आमरण अनशन किया तो शुरू में डा. अम्बेडकर ने कहा ''महात्मा कोई अमर व्यक्ति नहीं है, और न कांग्रेस ही अमर है। बहुत से महात्मा आये और चले गये। लेकिन अछूत अछूत ही बने रहे।'' लेकिन जब आमरण अनशन के कारण सचमुच महात्मा गांधी के जीवन पर खतरा मंडराने लगा तो देश के हित के लिए डा. अम्बेडकर ने महात्मा गांधी के साथ पूना-पैक्ट (1932) किया। और स्वतंत्रता मिलने के बाद संविधान सभा के प्रारूप समिति के अध्यक्ष एवं भारत के प्रथम कानून मंत्री के रूप में डा. अम्बेडकर का चुनाव महात्मा गांधी की प्रेरणा से ही हुआ था। भारतीय संविधान में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए आरक्षण के बारे में सैद्वांतिक सहमति गांधी-अम्बेडकर के पूना पैक्ट के दौरान ही हो गई थी। महात्मा गांधी पाकिस्तान की तरह दलितिस्तान की संभावना के कारण पृथक निर्वाचन मंडल के खिलाफ थे लेकिन अछूतोध्दार की हर उस कोशिश के पक्ष में थे जो अहिंसा एवं सत्य के साथ सर्वोदय के उनके आदर्श के खिलाफ न हो। दलितों और जनजातियों को मुख्यधारा में लाने के लिए कानूनी संरक्षण या आरक्षण के बारे में गांधीजी और डा. अम्बेडकर के विचारों में 1932 के बाद सैद्वांतिक विरोध की जगह पूरकता ज्यादा दिखती है।


     महात्मा गांधी अछूतोध्दार के लिए सवर्ण हिन्दुओं के हृदयपरिवर्तन के लिए वैष्णव धर्म और भक्ति आंदोलन की सभ्यतामूलक चेतना में जैन दर्शन के अनेकांतवाद से भी प्रभावित थे। उनका मानना था कि अछूतों की कुछ समस्यायें तो सवर्ण हिन्दुओं की अशिक्षा के कारण पैदा हुई है लेकिन उनकी कुछ समस्यायें हर समुदाय के किसानों, श्रमिकों एवं शिल्पकारों की समस्या है जो उपनिवेशवादी गुलामी के कारण पैदा हुई है। इसके निवारण के लिए महात्मा गांधी ने बुनियादी शिक्षा, ग्राम स्वराज, सर्वोदय और आत्म-परिष्कार की वकालत किया। महात्मा गांधी समाज की समस्या को समाज के लोगों (जिसे वे लोक कहते थे) के स्तर पर आपसी सद्भाव से हल करने के पक्ष में थे। वे राज्य की बहुत सीमित भूमिका देखते थे। आधुनिक विधि व्यवस्था, संसद, पुलिस-स्टेशन आदि पर उनको ज्यादा भरोसा नहीं था। दुर्खीम के गिल्ड-समाजवाद को ही वे सर्वोदय के नाम से भारतीय समस्याओं के समाधान के लिए प्रस्तुत कर रहे थे। गांधीजी के प्रति अपार आदर के बावजूद कांग्रेस की सरकार गांधीजी की विचारधारा पर नहीं चल पायी। जवाहरलाल नेहरू आधुनिक पश्चिम की औद्योगिक व्यवस्था के तहत मार्क्सवाद से प्रभावित प्रजातांत्रिक समाजवाद के समर्थक थे।


     महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के विपरीत डा. अम्बेडकर समाजवादी नहीं थे। उनकी शिक्षा अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स में हुई थी। वे मार्क्सवादी समाजवाद के स्थान पर पश्चिमी यूरोप और अमेरिका में प्रचलित प्रजातांत्रिक पूँजीवादी व्यवस्था के तहत ही बौद्व धर्म 'बहुजन हिताय और बहुजन सुखाय' वाले आदर्श समाज के निर्माण के पक्षधर थे जिसमें हर व्यक्ति एक दूसरे के समान होगा। फ्रांसीसी क्रांति के नारे स्वतंत्रता, समानता और भातृत्व की भावना को वे भगवान बुध्द, महात्मा कबीर और महात्मा ज्योतिबा के चिंतन का भी केन्द्रीय सरोकार मानते हैं। वे अक्सर कहा करते थे कि यह सुखद संयोग है कि फ्रांसीसी क्रांति के नेताओं को भी भारतीय मनीषियों की तरह सभ्य समाज के लिए स्वतंत्रता, समानता और भ्रातृत्व की विचारधारा उतनी ही आवश्यक लगती थी।


     आधुनिक विधि व्यवस्था, संसद और आधुनिक शिक्षा में उनकी गहरी आस्था थी। वे अधिकांशत: पश्चिमी अभिजन की शैली में कोट-पैंट और टाई लगाते थे। उनकी स्पष्ट मान्यता थी कि दलितों को न सिर्फ ऊँची शिक्षा हासिल करनी चाहिए बल्कि सत्ता संचालन में प्रत्यक्ष भागीदारी करनी चाहिए। बिना राजनैतिक-आर्थिक शक्ति और ज्ञान प्राप्त किये दलितों और अछूतों के लिए उन्नति के सारे मार्ग बंद हैं। अत: उन्होंने अपने अनुयायियों को आपस में राजनैतिक रूप से संगठित होकर सत्ता में प्रत्यक्ष भागीदारी के लिए प्रेरित किया। 1920 से 1956 तक पूरे जीवन वे दलितों को राजनैतिक रूप से संगठित होकर सत्ता में प्रत्यक्ष भागीदारी के लिए विभिन्न मंचों पर सक्रिय रहे। लेकिन अपने जीवन में राजनैतिक स्तर पर अपने दल रिपब्लिकन पार्टी को उतनी सफलता नहीं दिला पाये। लेकिन कालांतर में उनके विचारों से प्रेरित दलित आंदोलन से कांसीराम और मायावती के नेतृत्व में बहुजन समाज पार्टी का विकास हुआ जिसने 1980 के दशक से उत्तर प्रदेश की राजनीति में पहले दलित वोटों को गोलबंद करने में सफलता पायी फिर गठबंधन की राजनीति के दौर में 1993 से सत्ता में प्रत्यक्ष भागीदारी पाना शुरू किया। 1995 से अब तक मायावती उत्तर प्रदेश की चार बार मुख्यमंत्री बन चुकी हैं और उत्तर भारत के अन्य राज्यों में भी बहुजन समाज पार्टी का विस्तार हो रहा है। अब दलितों को अछूत कहना तो दूर उनके नेतृत्व में राजनीतिक गठबंधन बनाने की होड़ सवर्ण जातियों में आम बात हो गई है।


  शिक्षण केन्द्रों, नौकरियों, विधान सभा और लोक सभा में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए 1952 से आरक्षण लागू करवा लेना डा. अम्बेडकर के लिए बड़ी उपलब्धी मानी जाती है। दलित, आदिवासियों और स्त्रियों के अधिकारों के रक्षा के लिए भी डा. अम्बेडकर ने कई कानून बनवाया। उनकी प्रेरणा से अनुसूचित जाति आयोग भी बना।


     महात्मा गांधी के विपरीत डा. अम्बेडकर गांवों की अपेक्षा नगरों में एवं ग्रामीण शिल्पों या कृषि की व्यवस्था की तुलना में पश्चिमी समाज की औद्योगिक विकास में भारत और दलितों का भविष्य देखते थे। वे मार्क्सवादी समाजवाद की तुलना में बौध्द मानववाद के समर्थक थे जिसके केन्द्र में व्यक्तिगत स्वतंत्रता, समानता एवं भ्रातृत्व की भावना है।

Wednesday, December 26, 2012

अस्मिता की लड़ाई

दिल्ली गैंगरेप के विरोध में लोगों का गुस्सा चौतरफा देखा जा रहा है. लोग बात कर रहे हैं कि लड़कियों-स्त्रियों की सुरक्षा के मुद्दे का स्थायी समाधान किस तरह निकले. 1970 के दशक के उत्तरार्ध में मथुरा बलात्कार कांड के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय का जो फैसला आया था, उसके बाद जिस तरह देशव्यापी प्रदर्शन हुए थे और सरकार को बलात्कार संबंधी कानून में बदलाव करना पड़ा था, उसी किस्म का वातावरण इस वक्त बन गया है.

बलात्कार की घटना के बाद अकसर पीड़िता को ही दोषी ठहराने की हमारे समाज में एक रीति है, जिसमें उसे ही आधुनिक कपड़े पहनने से लेकर अकेले सड़क पर चलने को लेकर उलाहना दी जाती है. लेकिन इसके विपरीत इस बार एक सकारात्मक बात दिख रही है, लोग खुद कह रहे हैं कि सुरक्षा के लिए हम अपनी लड़कियों को घर में कैद नहीं कर सकते, न ही हर सार्वजनिक स्थल पर या लड़की जहां जाये वहां परिवारवालों की निगरानी में रख सकते हैं. आखिर लड़की होने का खामियाजा वे कबतक भुगतती रहेंगी, इसलिए सुरक्षित समाज तो उन्हें चाहिए ही.

सवाल पहले सरकार से है कि आखिर घटना घट जाने के बाद सख्ती की याद क्यों आती है? अब तक कानूनों को सख्त बना कर उस पर अमल क्यों नहीं हुआ? फास्ट ट्रैक कोर्ट को नीतिगत स्तर पर स्वीकृति मिलने के बाद भी वह क्यों नहीं बन सका? इस घटना से उपजे जनाक्रोश के दबाव में अब दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने हाइकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिख कर अनुरोध किया है कि वे दिल्ली में फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने की प्रक्रिया को तेज करें. गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने भी संसद के पटल पर कहा कि वह सुनिश्चित करेंगे कि उपरोक्त मामले की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में हो.

सरकार अगर इच्छाशक्ति दिखाये तो जल्द सुनवाई और अपराधियों को कड़ी सजा संभव है. इसका उदाहरण राजस्थान में मिला है, जहां एक विदेशी पर्यटक के साथ हुए यौन अत्याचार के मामले में घटना के महज 15 दिन के अंदर सारी सुनवाई पूरी कर ली गयी थी और आरोपियों को सजा सुनायी गयी थी. ऐसी त्वरित कार्रवाई अन्य सभी मामलों में क्यों संभव नहीं है, ताकि बलात्कार पीड़िता का न्याय व्यवस्था पर भरोसा बन सके और वह मामले को भूल कर जिंदगी में एक नया पन्ना पलट सके. आम तौर पर यही देखने में आता है कि कभी न्यायालयों में लंबित मामलों की अधिक संख्या के नाम पर, तो कभी मामले की जांच में पुलिस द्वारा बरती जानेवाली लापरवाही एवं विलंब के नाम पर फैसला आने में सालों

Sunday, November 25, 2012

राज्य मद्द निषेध दिवस मनाया गया


माद्द निषेध दिवस के अवसर पर नेहरु युवा केंद्र के तत्वावधान में अम्बेडकर क्लब मधुकरचक के द्वारा नुक्कड़ नाटक एवं प्रभात फेरी का कार्यक्रम क्लब के अध्यक्ष कुमार दीनबन्धु  के नेतृत्व में किया गया . कार्यक्रम द्वारा ग्रामीण नवयुवकों में बढ़ती नशाखोरी एवं इसके  कुप्रभावों पर   चिंता व्यक्त किया गया , साथ ही नशाखोरी से बचने के उपायों को नाटक मंचन के द्वारा दिखया गया .कार्यक्रम में सचिव दिलीप कुमार , सदस्यों रमण ,संजीव ,मनीष ,दीपक ,मिथिलेश , गौरव , बैद्द्नाथ ,निर्भय आदि उपस्थित  जबकि उपस्थित ग्रामीणों में पूर्व मुखिया  नागेश्वर यादव , भादो शर्मा , कैलाश मंडल , शिवन रजक , सुधीर यादव आदि के  द्वारा क्लब के समाज सुधार कार्यक्रम को सराहनीय बताया गया .
                 
                                                            विदित हो की अम्बेडकर क्लब मधुकरचक एक स्वयंसेवी सामाजिक संस्था के रूप में पिछले 14 वर्षों से वृहत उद्देश्य लिए  कार्य कर रही है  . इसके कार्यक्षेत्रों में निरक्षरता उन्मूलन , पर्यावरण संरक्षण , स्वास्थ्य एवं पोषण , स्वरोजगार प्रोत्साहन , लैंगिक समानता , रूढ़िवादी एवं अन्धविश्वासी परम्पराओं का उन्मूलन , दलित उत्थान , गंभीर रोग निरोधक उपाय जैसे कई समाज सुधार के क्षेत्रों को शामिल किया गया है . लेकिन सरकारी सहायता नहीं मिलने के कारण भारत सरकार के  खेल एवं युवा मंत्रालय के नेहरु युवा केंद्र से पंजीकृत यह क्लब अपने उद्देश्यों को पाने में संघर्ष कर रहा है .  सीमित संसाधनों के बावजूद यह क्लब अपनी स्वयं की रफ़्तार से कार्य कर रहा है .