Saturday, October 16, 2010

introduction of koshi area

भारत की अतिप्राचीन कोसी  नदी सभ्यता में आपका अभिनन्दन है ! 18 अगस्त २००८ को कोसी क्षेत्र के लोगो के लिए एक ऐसा अभिशापि  दिन आया जिसमे न सिर्फ लाखों लोग कल कलवित हुए बल्कि कोसी क्षेत्र की सभ्यता एवं स्वरुप ही बदल गया! सहरसा ,मधेपुरा ,सुपौल आदि क्षेत्र के हजारों गांव की तकदीरें एवं उनका भविष्य नियति के हाथ का खिलौना बन कर अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष  कर रहा है ! 
                                                            बढ़ विपदा की दास्ताँ मेरी नज़र में :-
          " बही गेला हो आपन गाम  ,डूबी गेला सब खेत के धान "
          " मरी गेला   सब्भई  किसान ,केना बचैभो आपन जान "
        "भांसी गेला सब घोर मकान , केना के आयता आब मेहमान"
          "कते  से लाब्भो तोयं सामान, कीरंग बनैभो तोयं पकवान "
         "कोसी माय के आईलो फरमान, बनी गेला सब लोग निधान "
        "भूख से  चिल्का बच्चा बिलखे , लुटी जय औरत के सम्मान"
         "लाय ललका ई लाख क जान , ख़तम भय गेला मान  अरमान"
               "जिनगी पर जे रहा शान उहो बहे गेला अब बेजान"
            "आब केना के जैभो गाम  , केना के खोज्भो घोर मकान"
          "केना उप्जैभो आब तोयं धान, किरंग के रहता तोहर प्राण !"
                 "वृद्ध रहै या रहै जवान , बच्चा औरत सब हलाकान "
             "बढ़  के साथ ई लोर बहै य भरी गेला य आब समसान !!"

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