Sunday, June 3, 2012

      अकेलापन
 यह अकेलापन
जैसे की बर्फीली फिजाएं ,
यह अकेलापन
जैसे अधूरी  कामनाएँ !
बस विरानियाँ ही ज़िन्दगी है
इनसे कोई कैसे बचाएं !
दूर तक सुनसान मंजर
हर तरफ बस रेत बंजर
जिनगी बोझिल सी लगती
देख न पता समंदर !
यह अकेलापन
जैसे की कोई एक परिंदा
 है कहाँ उसको जाना
उसका न कोई है ठिकाना
 बस हवाओं के सहारे
आसमा में ये बिचारे
 रात का  छाया अँधेरा
 अब कहाँ ढूंढे  बसेरा
बन जाये कोई सहारा
काब तलक न हो सवेरा !
 
यह अकेलापन
जैसे की उन्सुल्झी कथाएँ
जो कभी भी खत्म न हो
दे जो हर पल  ही व्यथाएँ
क्या हो मन की भावनाएं
जब कोई भी पास न हो
क्या करे कोई विरह
जब मिलन की आस  न हो !
 कैसा है अपना मुक्कद्दर
 जिसकी करुना हो न हम
 पर बस उसी की ठाणे
 ढूंढता उसको मैं दर दर !
यह अकेलापन
पीछा करती सी आत्माएं
 जो रूह बनकर डराती
बेचैनियों को संग लती
 इनसे तो बाचना है मुश्किल
हर घड़ी हर पल सताती !
यह अकेलापन 

जैसे कि कोई रात बैठी 
यादों की बारात बैठी
 दर्द के किस्से छुपाये
 एक अनकही सी बात बैठी !

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