Friday, July 6, 2012

वेतन पाने के लिए धरना - प्रदर्शन


बिहार सरकार  द्वारा संविदा पर बहाल शिक्षा कर्मियों को   वेतन भुगतान एवं वेतन  बढ़ोतरी का  लाभ  नही  मिलने के कारण  बिहारीगंज  में नियोजित  शिक्षकों द्वारा प्रखंड  संसाधन केंद्र में ताला जड़ कर विरोध किया गया !



 विदित हो कि इन शिक्षकों को बिहार सरकार द्वारा अकुशल मजदूरों के लिए तय की गई न्यूनतम मजदूरी 119 रुपिये प्रतिदिन से थोड़ा सा अधिक 200 रुपिये प्रतिदिन के हिसाब से मजदूरी दी जा रही है ! इतनी कम मजदूरी  के  बाद भी इन्हें अपना वेतन समय पर नहीं मिल पाता है जिस कारण इनके परिवार की माली हालत काफी बदतर हो रही है !इन  शिक्षकों से अधिक किस्मत वाले मनरेगा मजदूर हैं जिन्हें कम करने के 15 दिन  बाद मजदूरी गारंटी स्वरूप मिल जाती है , जबकि ये शिक्षक वेतन हेतू बी आर सी कार्यालय के चक्कर लगाते लगाते  थक जाते हैं !


समस्या सिर्फ बिहारीगंज की ही नहीं है , बल्कि बिहार के सभी प्रखंडों की कमोबेश यही स्थिति है ! एक तरफ हमारी सरकार शिक्षा को  बेहतर बनाने की  दिशा में नित नए नए प्रयोग  कर रही है  , जबकि शिक्षण व्यवस्था के मूल घटक (शिक्षक ) को सम्मानजनक वेतन एवं मूलभूत सुविधाएँ मुहैया कराने से भी परहेज कर रही है !


 आये दिन  हमें यह सुनने को मिलता है की अमुक  स्कूल में शिक्षक अनुपस्थित पाए गए !  यह कहना गलत नहीं होगा कि वर्तमान युग  अर्थयुग है !आर्थिक सुरक्षा का प्रश्न इस समय हर किसी के भविष्य के लिए  सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है ! महत्वपूर्ण विचारनीय प्रश्न यह है कि  इस मंहगाई के दौर में  6000 रुपिये से कैसे कोई एक परिवार के लिए महीने भर का बजट बनाये जिसमे भोजन , वस्त्र , आवास , स्वस्थ्य , शिक्षा ,के खर्च को शामिल किया जा सके !


स्वाभाविक है कि  इन परिस्थितियों में शिक्षकों का विद्द्यालय के प्रति आध्यात्मिक एवं मानसिक लगाव नहीं बन पायेगा  , और ऐसी परिस्थिति में सरकार  द्वारा शिक्षा के  क्षेत्र में किये जा रहे सारे प्रयोग ( शिक्षक डायरी , सतत एवं व्यापक मूल्यांकन ) असफल ही साबित होंगे !

Tuesday, June 12, 2012

मत छीनो मुझसे मेरा बचपन ...!

खुशियों के बसेरे में, मैं भी जीना चाहता हूं,

महसूस करना चाहता हूं बचपन की मौज-मस्ती,

तारों की टिमटिमाहट मैं भी देखना चाहता हूं,

आखिर मैं भी पढ़ना चाहता हूं,

आखिर मैं भी पढ़ना चाहता हूं…………..



World Day Against Child Labour

बचपन जिंदगी का सबसे सुहाना और यागदार सफर होता है. बचपन की मौज-मस्ती को इंसान मरते दम तक याद रखता है. मां की ममता, पिता का स्नेह, दोस्तों का साथ, स्कूल की मौज शायद इन्हीं यादों में बचपन कब बीत जाता है कोई जान ही नहीं पाता. लेकिन बचपन की यादें हर किसी के लिए सुहानी नहीं होतीं. कई लोगों के लिए बचपन एक अभिशाप होता है. जिस बचपन को लोग वरदान मानते हैं वह अभिशाप कैसे हो सकता है? अगर यह जानना है तो उस बच्चे की मार्मिक कहानी पर एक नजर अवश्य डालिए जो आपके घर के बाहर के ढाबे या चाय वाले के यहां बर्तन धोता है, कड़वी बचपन की यादों का स्वाद उस बच्चे को ही पता होता है जो रेलवे स्टेशनों पर पड़ी प्लास्टिक की बोतलों को इकठ्ठा करता है.

Chil LabourWorld Day Against Child Labour

आज बाल श्रम निरोध दिवस है. साल के कई सौ दिनों में से एक जिसे समाज के बुद्धिजीवियों ने उन बच्चों के नाम किया है जो बचपन की मौज मनाने की बजाय श्रम करते हैं. हम लोग जब भी किसी मीटिंग या सामाजिक स्थल पर बैठे होते हैं तो समाज के बारे में बड़ी-बड़ी बाते करने से पीछे नहीं हटते. बाल श्रम भी एक ऐसा ही टॉपिक है जिस पर लोग अक्सर किसी चाय वाले के पास बैठकर लंबा भाषण देते हैं और फिर आवाज लगाते हैं “ओए छोटू ग्लास ले जा.”

World Day Against Child Labour

बड़ी-बड़ी बातें, बड़े-बड़े नारे लगाने के बाद भी बाल श्रमिकों की हालत आज भी वैसी ही है जैसे पहले थी. भारत समेत लगभग सभी विकासशील देश और यहां तक की विकसित देशों में भी आपको बाल श्रम देखने को मिलेगा. चाय वाले की दुकान हो या कोई होटल और तो और भारत में तो बाल श्रमिकों का एक बड़ा हिस्सा चूड़ी बनाने, पटाखा बनाने और अन्य खतरनाक कामों में भी लिप्त है. इन बच्चों को चंद पैसा देकर इनके मालिक इनसे जरूरत से ज्यादा काम कराते हैं. कम पैसे में यह बच्चे अच्छी मजदूरी देते हैं और ज्यादा आवाज भी नहीं उठाते, यही वजह है कि ऐसे कारखानों के मालिक बच्चों को शोषित करने का कोई भी मौका नहीं गंवाते.

World Day Against Child Labour

सैकड़ों बचपन असमय ही हाथों में कलम के बदले पेट की आग बुझाने के लिए किसी होटल में जूठन धोने, ईट भट्ठा में ईट ढोने, खेतों में मिट्टी काटने, साइकिल दुकानों अथवा मोटर गैराजों में मजदूरी करने में बीत रहा है. बाल श्रम अधिनियम बनने के बाद भी बाल श्रमिकों पर अंकुश नहीं लग पा रहा है. होटल, ढाबों, उद्योगों और कारखानों में बाल श्रमिकों को काम करते देखा जा सकता है. जबकि श्रम विभाग इस ओर मूकदर्शक बना है.


Government report on child
योजना आयोग (भारत सरकार ) के  अनुसार वर्तमान समय में लगभग 49 लाख बाल श्रमिक भारत में कार्यरत हैं , जबकि सरकार के पास उपलब्ध गैर सरकारी संगठनो द्वारा दिए गए आंकड़ो के अनुसार यह संख्या 24 करोड़ से ऊपर बताई जा रही है !
 

बाल श्रम (प्रतिबंध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986

बाल श्रम (उन्‍मूलन और विनियमन) अधिनियम, 1986 चौदह वर्ष से कम उम्र के बच्‍चों को 18 प्रकार के कारखानों तथा 65 प्रक्रियाओं में नियोजन पर प्रतिबंध लगाया गया  है ,और कुछ अन्‍य रोज़गारों में उनके काम की स्थितियों को विनियमित करने के लिए अधिनियमित किया गया था.


बाल श्रम प्रतिबंधित एवं विनिमय अधिनियम की धारा तीन के अतिरिक्त प्रावधानों पर एक माह की सजा और एक हजार का जुर्माने का प्रावधान है. लेकिन इसके बाद भी बाल श्रम रुकने का नाम नहीं ले रहा है. सरकार ने कानून से विरक्त हुए बच्चों के लिए बाल श्रमिक स्कूल भी खोले हैं लेकिन वह भी निरर्थक ही साबित हो रहे हैं.


श्रम विभाग अगर कड़ाई से कानून का पालन कराए और श्रम कराने वाले अभिभावकों व काम लेने वाले मालिकों को समझाने का अभियान छेड़ दे तो कुछ बात बन सकती है. लेकिन समाज के इस वर्ग की किसी को खास परवाह नहीं है. सरकार के पास देखने के लिए और भी कई मुद्दे हैं और श्रम विभाग को बाल श्रमिकों से पैसे तो मिलते नहीं जो उनकी मदद करे. आज बाल श्रमिक निषेध दिवस पर उम्मीद है सरकार और जनता का ध्यान इस ओर जरूर जाएगा.
विलखता बचपन
छोटे से बचपन पर दण्डों की भरमार
होता था नित्य बचपन पर प्रहार !
न कोई कापी न कोई रेट
छोटा सीना लम्बा सा पेट !
बेचारा 'सुरना' भूख की तंगियों से
आ पड़ा था अपने गाँव की गलियों से!
कभी बर्तन को घिसना कभी चौका लगाना
थक पड़े अगर तो वही दंड पुराना !
बदन में घमौरी आँखों में पानी
ये कैसी विडंबना है ये कैसी है कहानी ...?







Monday, June 4, 2012

मेरे बच्चे अभी बहुत छोटे हैं लेकिन उनके साथ बिताए हर पल मेरी आंखों के सामने आ गए. तीन महीने पहले बुखार से तप रहे तीन साल के बेटे की दवाई लाने के लिए रात के एक बजे अपने घर से पंद्रह किलोमीटर दूर जाना, अंजानी सडकों में कैमिस्टों की खुली दुकानें टटोलते खाली हाथ वापस आना और रातभर गीली पट्टी करते हुए सुबह डॉक्टर के क्लीनिक खुलने का इंतज़ार करना......
ऐसे में मुझे बरबस मेरे पिता याद आते रहे… और मम्मी का मुझे अक्सर यह बतलाना कि कैसे बचपन में मेरी सलामती के लिए दोनों रात-रात भर जागते रहे
थे......

और फिर मुझे बार-बार यह भी याद आता रहा कि न जाने कितने ही मौकों पर मैंने जानते हुए उनका दिल दुखाया… अनजाने की तो कोई गिनती भी न होगी.

आप शायद समझ रहे होंगे मेरे भीतर क्या चल रहा है. एक दिन मैं भी बूढ़ा हो जाऊंगा और उस समय के लिए मैं अपने बच्चों से आज यही कहना चाहूंगा :-

“मेरे प्यारे बच्चों,

जिस दिन तुम्हें यह लगे कि मैं बूढ़ा हो गया हूं, तुम खुद में थोड़ा धीरज लाना और मुझे समझने की कोशिश करना…

जब खाना खाते समय मुझसे कुछ गिर जाए… जब मुझसे कपड़े सहेजते न बनें… तो थोड़ा सब्र करना, मेरे बच्चों…और उन दिनों को याद करना जब मैंने तुम्हें
यह सब सिखाने में न जाने कितना समय लगाया था.

मैं कभी एक ही बात को कई बार दोहराने लगूं तो मुझे टोकना मत. मेरी बातें सुनना. जब तुम बहुत छोटे थे तब  हर रात मुझे एक ही कहानी बार-बार सुनाने
के लिए कहते थे, और मैं ऐसा ही करता था जब तक तुम्हें नींद नहीं आ जाती थी.

अगर मैं कभी अपने को ठीक से साफ न कर पाऊं तो मुझे डांटना नहीं… यह न कहना कि यह कितने शर्म की बात है…तुम्हें याद है जब तुम छोटे थे तब तुम्हें अच्छे से नहलाने के लिए मुझे नित नए जतन करने पड़ते थे?

हर पल कितना कुछ बदलता जा रहा है. यदि मैं नया रिमोट, मोबाइल, या कम्प्यूटर चलाना न सीख पाऊं तो मुझपर हंसना मत… थोड़ा वक़्त दे देना… शायद मुझे यह सब चलाना आ जाए.

मैं तुम्हें ज़िंदगी भर कितना कुछ सिखाता रहा…अच्छे से खाओ, ठीक से कपड़े पहनो, बेहतर इंसान बनो, हर मुश्किल का डटकर सामना करो… याद है न?

बढ़ती उम्र के कारण यदि मेरी याददाश्त कमज़ोर हो जाए… या फिर बातचीत के दौरान मेरा ध्यान भटक जाए तो मुझे उस बात को याद करने को मौका ज़रूर देना. मैं कभी कुछ भूल बैठूं तो झुंझलाना नहीं… गुस्सा मत होना… क्योंकि उस समय तुम्हें अपने पास पाना और तुमसे बातें कर सकना मेरी सबसे बड़ी खुशी होगी… सबसे बड़ी पूंजी होगी.

अगर मैं कभी खाना खाने से इंकार कर दूं तो मुझे जबरन मत खिलाना. बुढ़ापे में सबका हिसाब-खिताब बिगड़ जाता है. मुझे जब भूख लगेगी तो मैं खुद ही खा
लूंगा.

एक दिन ऐसा आएगा जब मैं चार कदम चलने से भी लाचार हो जाऊंगा…उस दिन तुम मुझे मजबूती से थामके वैसे ही सहारा दोगे न जैसे मैं तुम्हें चलना सिखाता
था?

फिर एक दिन ऐसा भी आएगा जब मैं तुमसे कहूंगा – “मैं अब और जीना नहीं चाहता… मेरा अंत निकट है”. यह सुनकर तुम नाराज़ न होना… क्योंकि एक दिन
तुम भी यह जान जाओगे वृद्धजन ऐसा क्यों कहते हैं.

यह समझने की कोशिश करना कि एक उम्र बीत जाने के बाद लोग जीते नहीं हैं बल्कि अपना समय काटते हैं. 

एक दिन तुम यह जान जाओगे कि अपनी तमाम नाकामियों और गलतियों के बाद भी मैंने हमेशा तुम्हारा भले के लिए ही ईश्वर से प्रार्थना की.

अपने प्रेम और धीरज का सहारा देकर मुझे ज़िंदगी के आखरी पड़ाव तक थामे रखना. तुम्हारी प्रेमपूर्ण मुस्कान ही मेरा संबल होगी.

कभी न भूलना मेरे प्यारे बच्चों… कि मैंने तुमसे ही सबसे ज्यादा प्रेम किया.


Sunday, June 3, 2012

      अकेलापन
 यह अकेलापन
जैसे की बर्फीली फिजाएं ,
यह अकेलापन
जैसे अधूरी  कामनाएँ !
बस विरानियाँ ही ज़िन्दगी है
इनसे कोई कैसे बचाएं !
दूर तक सुनसान मंजर
हर तरफ बस रेत बंजर
जिनगी बोझिल सी लगती
देख न पता समंदर !
यह अकेलापन
जैसे की कोई एक परिंदा
 है कहाँ उसको जाना
उसका न कोई है ठिकाना
 बस हवाओं के सहारे
आसमा में ये बिचारे
 रात का  छाया अँधेरा
 अब कहाँ ढूंढे  बसेरा
बन जाये कोई सहारा
काब तलक न हो सवेरा !
 
यह अकेलापन
जैसे की उन्सुल्झी कथाएँ
जो कभी भी खत्म न हो
दे जो हर पल  ही व्यथाएँ
क्या हो मन की भावनाएं
जब कोई भी पास न हो
क्या करे कोई विरह
जब मिलन की आस  न हो !
 कैसा है अपना मुक्कद्दर
 जिसकी करुना हो न हम
 पर बस उसी की ठाणे
 ढूंढता उसको मैं दर दर !
यह अकेलापन
पीछा करती सी आत्माएं
 जो रूह बनकर डराती
बेचैनियों को संग लती
 इनसे तो बाचना है मुश्किल
हर घड़ी हर पल सताती !
यह अकेलापन 

जैसे कि कोई रात बैठी 
यादों की बारात बैठी
 दर्द के किस्से छुपाये
 एक अनकही सी बात बैठी !

Sunday, December 25, 2011

BIHARIGANJ::: Move towards education

सरकार द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में किये जा रहे गंभीर प्रयासों का का नतीजा अब इस समाज में दिखने लगा है ! आसपास के दूर दराज के गावों से सायकिलों पर सवार होकर आती हुई लड़कियों के झुण्ड को देख कर यंहा के शैक्षिक वातावरण का अंदाजा सहज लग जाता है ! एक समय वो भी था जब पास के गावों जैसे गमैल , मधुकरचक, बीडी रणपाल , बिशनपुर , मोहनपुर ,पतनी आदि क्षेत्र की सामान्य लड़कियों को माध्यमिक शिक्षा भी नहीं मिल पाती थी !शायद उस समय लोगों के मन में शिक्षा के प्रति न तो जिज्ञासा थी और शयद न आज के तरह का वातावरण था !
२००७ में बड़े पैमाने पर नियोजित शिक्षकों की बहाली में जब महिला उम्मीदवारों को जब ५० % आरक्षण का लाभ मिला और बड़े पैमाने पर महिलाओं का नियोजन किया गया , तब बिहारीगंज समाज  लोगों के मन में शिक्षा के प्रति उदार रवैया उजागर हुआ ! आज अगर बिहारीगंज बालिका उच्च विद्यालय की बात की जाय, यंहा छात्रों की इतनी संख्या है कि बैठने कि जगह कम पड़ जाती है! गमैल उच्च विद्यालय , जंहा आज से चार-पाँच साल पहले छात्र - छात्राएं नजर ही नहीं आती थी वहीँ आज ५०० से ऊपर छात्र छात्राएं  रोज विद्यालय आती है ! ठीक इसी तरह कि स्थिति आसपास के सभी विद्यालयों की है !
 आज इसके परिणाम हमारे समाज में स्पस्ट दिखाई देने लगें हैं !मेट्रिक की परीक्षा में प्रथम श्रेणी के विद्यार्थियों की संख्या लगातार बढ़ रही है ! हर गावं के हर तबके , हर समाज के छात्र अपनी सफलता का परचम लहरा रहें हैं !
प्रतियोगिता परीक्षाओं की बात की जाय तो  बिहारीगंज के छत्र छत्राओं की  महत्ता उसमे भी स्पष्ट है ! दरोगा बहाली में जहाँ परितोष कुमार , ब्रजेश कुमार , नन्द किशोर नंदन  अपनी सफलताओं से अन्य छात्रों के प्रेरणा श्रोत बने हैं , वहीँ  नेवी में अम्बुज भूषण , इन्डियन एयर फोर्स में अमित कुमार भारती , रितेश कुमार गुप्ता , सी.पी ओ. में प्रेमशंकर कुमार ,  बैंकिग सेवा में  अमित गुप्ता और राजदीप कुमार ,दीपक कुमार सिंह  , चिकित्सा सेवा में डा. मिथिलेश कुमार , डा. संजीव कुमार  डा. नारायण कुमार , डा. सुनीता कुमारी ,डा.  दीपक  कुमार अदि ऐसे नए चेहरें हैं जिन्होंने बिहार्गंज समाज के लिए एक नी प्रेरणात्मक कहानी लिखी ! इन्फोर्मासन  टेक्नोलोजी  और मेनेजमेंट  फिल्ड में अखिलेश गुप्ता , गौतम कुमार ,रुपेश कुमार सिंह , रिंकू गुप्ता , अमित सर्राफ , विनय कुमार सिंह  आदि के नाम बड़े ही सम्मानजनक रूप से गिनाये जा सकते हैं !
इसके अलावे भी बहुत ऐसे नाम हैं जो हमारी जेहन से बहार हैं और जिनपर बिहारीगंज का समाज गर्व महशुश करता है ! हक़ में सम्पन्न हुई शिक्षक पात्रता परीक्षा में  यह उम्मीद किया जा सकता है की बहुत सरे नए लड़के लड़कियां  सफल होकर इस समाज को शिक्षा का अलख दिखा कर इसे उन्नति पथ पर अग्रसर करे!










Tuesday, December 20, 2011

traditional transportation

बिहारीगंज  बनमनखी रेलखंड के बिच चलने वाली रेलगाड़ी "गजराज एक्सप्रेस " स्थानीय लोगों जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चूका है ! वर्ष २००८ में आने वाली भयानक बाढ़ यह ट्रेन एक जीवन रेखा के रूप में साबित हुई , जो न जाने कितने मासूमो की जिंदगी कोई रक्षा की ! इस रूट में पड़ने वाले स्थान जैसे राजघाट , रघुवान्सनगर, बारह्राकोठी ,सुख्सैना , ओउराही आदि जगहों के लोग अपने दैनिक जीवन में इस रेल को यथार्थ मानकर चलते हैं ! इस क्षेत्र  में सड़क संपर्क के न्यूनता के कारण इसकी महत्ता और भी बढ़ जाती है !

पूर्व रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव के काल में बिहारीगंज को कुर्सेला (कटिहार ) से जोड़ने का प्रस्ताव भी पेश किया गया साथ ही साथ इस रूट में पड़ने वाले स्टेशन जैसे रोपौली , तिकापत्ती ,भवानीपुर  आदि जगहों का सर्वेक्षण कराकर रेलमंत्रालय द्वारा बोर्ड भी लगाया गया , किन्तु इश दिशा में अभी तक  कोई भी प्रगति नहीं हो पाई है  और यंहा  के लोग खुद को ठगा महशुश कर रहें  हैं !

shikshak patrata pariksha